भारतकोश
गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary

महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished448 पृष्ठ

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२०० श्रीगीतगोविन्दम् यह सब सोच-विचारना व्यर्थ है—वह अवश्य ही आयेंगी—ऐसा निश्चय कर शय्याकी रचना करना प्रारम्भ कर देते हैं। ‘कदन’ शब्दसे तात्पर्य है—मुझसे अनुराग होनेके कारण अवश्य ही आयेंगी। अतः उत्कण्ठित होकर बार-बार देखते हैं। प्रस्तुत श्लोकमें हरिणी छन्द तथा ‘दीपक’ अलंकार है। त्वद्वाम्येन समं समग्रमधुना तिग्मांशुदस्तं गतो गोविन्दस्य मनोरथेन च समं प्राप्तं तमःसान्द्रताम्। कोकानां करुणस्वनेन सदृशी दीर्घा मदभ्यर्थना तन्मुग्धे! विफलं विलम्बनमसौ रम्योऽभिसार-क्षणः ॥२॥ अन्वय—[अतः सम्प्रत्येव गमनं साम्प्रतमिति समयानुकूल्य- माह]—अधुना त्वद्वाम्येन (तव प्रतिकूलतया अभिमान-वशात् मौनभावेन इति भावः) समं (सह) तिग्मांशुः (सूर्यः) समग्रं (सम्पूर्णं यथा तथा) अस्तं गतः गोविन्दस्य मनोरथेन च समं तमः (तिमिरं) सान्द्रतां (निविड़तां) प्राप्तम् [त्वयि गोविन्दस्य अनुरागः यथा क्रमशः गाढ़तां गतः तद्वदन्धकारोऽपि क्रमशः निविड़ः सञ्जात इत्यर्थः) मदभ्यर्थना (मम अभ्यर्थना अनुरोधश्च) कोकानां (चन्द्रकाराणां) करुणस्वरेन (कातरविलापेन) [रात्रौ तेषां विच्छेदादिति भावः]; तत् (तस्मात्) अयि मुग्धे, विलम्बनं विफलम्; [यतः] असौ अभिसारक्षणः (कान्ताभिगमन- कालः) रम्यः (प्रीतिप्रदः) [प्रियतमः उत्कण्ठितः रम्यश्च अभिसारक्षणः, चिरमभ्यर्थनपरा सखी, तथापि वेशादिव्याजेन गमनविलम्बनमिति मौग्ध्यम्] ॥२ ॥ अनुवाद—हे मुग्धे! तुम्हारी वामता (प्रतिकूलता) के साथ-साथ यह दिवाकर भी सम्पूर्ण रूपसे अस्त हो गया। श्रीकृष्णके मनोरथके साथ ही अन्धकार सान्द्रता (घनत्व) को प्राप्त हो गया। विरह-विकल चक्रवाक पक्षीके रात्रिकालमें करुण स्वर निरन्तर विलापके समान मेरी अभ्यर्थना भी