गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)
Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary
महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपञ्चमः सर्गः- आकाङ्क्ष-पुण्डरीकाक्षः १९९ अनुवाद - हे कामिनि ! तुम्हारे प्रिय श्रीकृष्ण मदन-यन्त्रणासे सन्तप्त होकर निकुंज-गृहमें तुम्हारी प्रतीक्षा कर रहे हैं। वे बार-बार दीर्घ श्वास लेते हुए चकित नेत्रोंसे चहुँदिशि देखते हैं। बार-बार अस्फुट शब्दोंसे विलाप करते हुए लताकुंजसे बाहर आते हैं और पुनः उसमें प्रवेश करते हैं एवं दुःखी होते हैं। बार-बार शय्याका निर्माण करते हैं और आकुल होकर बार-बार तुम्हारा आगमन-पथ देखते हैं। पद्यानुवाद- तेरे आनेकी आशा जब लगती पल पल घटने। तभी विकलता बढ़ जाती है, लगता धीरज हटने ॥ कभी प्रतीक्षा-दृगसे लखते और उसासें भरते। होकर भ्रान्त कुंजमें जाते फिर आँखोंसे ढरते ॥ बार-बार शय्या रचते हैं, खूब साधना साधे। मदन-कदन-परिक्लान्त कान्त हैं तेरे री सखि ! राधे ॥ बालबोधिनी - इस प्रबन्धकी उपसंहृति करते हुए कवि कहते हैं कि सखी श्रीराधाको श्रीकृष्णके सन्निकट पहुँचनेके लिए अनेक प्रकारसे प्रेरित कर रही है कि श्रीकृष्ण तुम्हारे विरहमें कामजन्य कष्टसे दुःखी हैं। तुम अभी तक आयी नहीं हो - ऐसा सोचकर बार-बार साँस लेते हैं, दीर्घ-निःश्वासधारा छोड़ते हैं। तुम अभी तक उनके पास पहुँची नहीं हो-प्रतीक्षारत होकर बार-बार चारों दिशाओंमें देखते हैं। तुम किस दिशासे आ रही हो, यह देखनेके लिए लताकुंजसे बाहर आते हैं। पुनः लताकुंजमें प्रवेश करते हैं, यह समझकर कि तुम कहीं आकर वहाँ छिप तो नहीं गयी हो? कभी बाहर, कभी अन्दर, बार-बार क्यों ऐसा करते हैं? इसलिए कि 'वह आ तो नहीं रही हैं, वह क्यों नहीं आयीं, किस कारणसे रुक गयीं अथवा कहीं डर तो नहीं गयीं'- इस प्रकारसे उसके अनागमनके कारणका विचार करके बार-बार बहुत प्रकारसे अव्यक्त शब्द करते हैं। पुनः