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गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary

महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished448 पृष्ठ

पञ्चमः सर्गः- आकाङ्क्ष-पुण्डरीकाक्षः १९९ अनुवाद - हे कामिनि ! तुम्हारे प्रिय श्रीकृष्ण मदन-यन्त्रणासे सन्तप्त होकर निकुंज-गृहमें तुम्हारी प्रतीक्षा कर रहे हैं। वे बार-बार दीर्घ श्वास लेते हुए चकित नेत्रोंसे चहुँदिशि देखते हैं। बार-बार अस्फुट शब्दोंसे विलाप करते हुए लताकुंजसे बाहर आते हैं और पुनः उसमें प्रवेश करते हैं एवं दुःखी होते हैं। बार-बार शय्याका निर्माण करते हैं और आकुल होकर बार-बार तुम्हारा आगमन-पथ देखते हैं। पद्यानुवाद- तेरे आनेकी आशा जब लगती पल पल घटने। तभी विकलता बढ़ जाती है, लगता धीरज हटने ॥ कभी प्रतीक्षा-दृगसे लखते और उसासें भरते। होकर भ्रान्त कुंजमें जाते फिर आँखोंसे ढरते ॥ बार-बार शय्या रचते हैं, खूब साधना साधे। मदन-कदन-परिक्लान्त कान्त हैं तेरे री सखि ! राधे ॥ बालबोधिनी - इस प्रबन्धकी उपसंहृति करते हुए कवि कहते हैं कि सखी श्रीराधाको श्रीकृष्णके सन्निकट पहुँचनेके लिए अनेक प्रकारसे प्रेरित कर रही है कि श्रीकृष्ण तुम्हारे विरहमें कामजन्य कष्टसे दुःखी हैं। तुम अभी तक आयी नहीं हो - ऐसा सोचकर बार-बार साँस लेते हैं, दीर्घ-निःश्वासधारा छोड़ते हैं। तुम अभी तक उनके पास पहुँची नहीं हो-प्रतीक्षारत होकर बार-बार चारों दिशाओंमें देखते हैं। तुम किस दिशासे आ रही हो, यह देखनेके लिए लताकुंजसे बाहर आते हैं। पुनः लताकुंजमें प्रवेश करते हैं, यह समझकर कि तुम कहीं आकर वहाँ छिप तो नहीं गयी हो? कभी बाहर, कभी अन्दर, बार-बार क्यों ऐसा करते हैं? इसलिए कि 'वह आ तो नहीं रही हैं, वह क्यों नहीं आयीं, किस कारणसे रुक गयीं अथवा कहीं डर तो नहीं गयीं'- इस प्रकारसे उसके अनागमनके कारणका विचार करके बार-बार बहुत प्रकारसे अव्यक्त शब्द करते हैं। पुनः

२०० श्रीगीतगोविन्दम् यह सब सोच-विचारना व्यर्थ है—वह अवश्य ही आयेंगी—ऐसा निश्चय कर शय्याकी रचना करना प्रारम्भ कर देते हैं। ‘कदन’ शब्दसे तात्पर्य है—मुझसे अनुराग होनेके कारण अवश्य ही आयेंगी। अतः उत्कण्ठित होकर बार-बार देखते हैं। प्रस्तुत श्लोकमें हरिणी छन्द तथा ‘दीपक’ अलंकार है। त्वद्वाम्येन समं समग्रमधुना तिग्मांशुदस्तं गतो गोविन्दस्य मनोरथेन च समं प्राप्तं तमःसान्द्रताम्। कोकानां करुणस्वनेन सदृशी दीर्घा मदभ्यर्थना तन्मुग्धे! विफलं विलम्बनमसौ रम्योऽभिसार-क्षणः ॥२॥ अन्वय—[अतः सम्प्रत्येव गमनं साम्प्रतमिति समयानुकूल्य- माह]—अधुना त्वद्वाम्येन (तव प्रतिकूलतया अभिमान-वशात् मौनभावेन इति भावः) समं (सह) तिग्मांशुः (सूर्यः) समग्रं (सम्पूर्णं यथा तथा) अस्तं गतः गोविन्दस्य मनोरथेन च समं तमः (तिमिरं) सान्द्रतां (निविड़तां) प्राप्तम् [त्वयि गोविन्दस्य अनुरागः यथा क्रमशः गाढ़तां गतः तद्वदन्धकारोऽपि क्रमशः निविड़ः सञ्जात इत्यर्थः) मदभ्यर्थना (मम अभ्यर्थना अनुरोधश्च) कोकानां (चन्द्रकाराणां) करुणस्वरेन (कातरविलापेन) [रात्रौ तेषां विच्छेदादिति भावः]; तत् (तस्मात्) अयि मुग्धे, विलम्बनं विफलम्; [यतः] असौ अभिसारक्षणः (कान्ताभिगमन- कालः) रम्यः (प्रीतिप्रदः) [प्रियतमः उत्कण्ठितः रम्यश्च अभिसारक्षणः, चिरमभ्यर्थनपरा सखी, तथापि वेशादिव्याजेन गमनविलम्बनमिति मौग्ध्यम्] ॥२ ॥ अनुवाद—हे मुग्धे! तुम्हारी वामता (प्रतिकूलता) के साथ-साथ यह दिवाकर भी सम्पूर्ण रूपसे अस्त हो गया। श्रीकृष्णके मनोरथके साथ ही अन्धकार सान्द्रता (घनत्व) को प्राप्त हो गया। विरह-विकल चक्रवाक पक्षीके रात्रिकालमें करुण स्वर निरन्तर विलापके समान मेरी अभ्यर्थना भी

पञ्चमः सर्गः—आकाङ्क्ष-पुण्डरीकाक्षः २०१ व्यर्थ हो गयी। मैं अति दीर्घकालसे करुण प्रार्थना कर रही हूँ। अब विलम्ब करना व्यर्थ है। अभिसारकी रमणीय बेला उपस्थित है। बालबोधिनी—हे राधे, हे मुग्धे! यह प्रियतमके समीप जानेका उपयुक्त समय है। अपने वाम स्वभावके अधीन होकर तुम मान करके बैठी ही रहीं, अब तो मान समाप्त हो गया है और इधर सूर्य भी अस्त हो गया। तुम्हारे रति-अभिसरणमें अब कोई बाधा नहीं है। गोविन्दके मनमें तुम्हारे प्यारके जो मनोरथ उठे थे, उनके साथ-साथ अन्धकार भी और गहरा हो उठा, मिलनकी आशा और तीव्र हो उठी। रात्रिकालमें चकवा-चकवी दोनों एक-दूसरेसे अलग-अलग होकर विरहाधिक्यके कारण दीर्घ करुण क्रन्दन करने लगते हैं। उसी दीर्घ पुकारके समान तुम्हारे समक्ष श्रीकृष्ण-मिलनके लिए की गयी मेरी अभ्यर्थना व्यर्थ ही चली गयी। हे मुग्धे, अब समय व्यर्थ मत गँवाओ, अभिसारका विशेष समय होता है, घना अन्धकार है, प्रियतम तुम्हारे लिए उत्कण्ठित हैं, तुम वेश-भूषादिके बहाने आगमनमें अब विलम्ब मत करो, जल्दी करो। प्रस्तुत श्लोकमें सहोक्ति अलंकार है तथा शार्दूलविक्रीड़ित छन्द है। आश्लेषादनु चुम्बनादनु नखोल्लेखादनु स्वान्तज- प्रोद्बोधादनु सम्भ्रमादनु रतारम्भादनु प्रीतयोः। अन्यार्थं गतयोर्भ्रमान्मिलितयोः सम्भाषणैर्जानतो- र्दम्पत्योरिह को न को न तमसि व्रीड़ाविमिश्रो रसः ॥३॥ अन्वय—[अथ उत्कण्ठावर्द्धनाय सुरतप्रीतेरत्याधिक्यं दर्शयति] —अन्यार्थं (अन्योन्यसङ्गलाभाय कार्यान्तरमुपलक्ष्य) गतयोः (सङ्केतस्थानं प्राप्तयोः) भ्रमात् (अन्वेषणाय भ्रमणात्) इह (ईदृशे सान्द्रे) तमसि (गाढ़ान्धकारे) मिलितयोः (सङ्गतयोः) सम्भाषणैः (कण्ठध्वनिभिः) जानतोः (केयं कश्चायमिति

२०२ श्रीगीतगोविन्दम् विन्दतोः) दम्पत्योः (स्त्रीपुंसयोः) [यथाक्रमं] आश्लेषात् (आलिङ्गनात्) अनु (पश्चात्), चुम्बनात् अनु, नखोल्लेखात् (नखानाम् उल्लेखात् आघातात्) अनु, स्वान्तजप्रोद्बोधात् (स्वान्तजस्य कामस्य प्रोद्बोधात् प्रकाशनात्), अनु, सम्भ्रमात् (साध्वसात्) अनु, रतारम्भात् (शृङ्गारारम्भणात्) अनु, प्रीतयोः (परितोषं गतयोः) कः कः व्रीड़ाविमिश्रः (व्रीड़या, कथं सहसैवं कर्त्तुमारब्धमित्येवं लज्जया विमिश्रः संवलितः) रसः (सम्भोगाद्यास्वादः) न [भवति] न [अपितु सर्वत्रैव सलज्जः रसास्वादः भवत्येव इत्यर्थः]। [एतेन अभिसर्त्तुं श्रीराधिका- प्रोत्साहनमुक्तम्] ॥३॥ अनुवाद—इस निविड़ तिमिरमें नायक-नायिका एक-दूसरेको प्राप्त करने हेतु अन्वेषणके लिए भ्रमण करते हुए अन्य नायक तथा नायिकाके भ्रमसे मिले हुए सम्भाषण द्वारा एक दूसरेको पहचान लेने पर परस्पर आलिङ्गन, पश्चात् चुम्बन, उसके बाद नख-क्षत अर्पण, पश्चात् कामोद्रेक होने पर मदनके आवेशमें सम्भ्रमके साथ रतिकेलिका प्रारम्भ होने पर सुरतक्रीड़ाके पश्चात् दोनों एक चमत्कारपूर्ण प्रीतिका अनुभव करोगे। इस अन्धकारमें व्रीड़ामिश्रित कौन-सा रस प्राप्त नहीं होगा? अतएव हे सुन्दरि ! चलो, शीघ्रातिशीघ्र केलि-कुंजमें चलें, भला ऐसे सुअवसरका क्या कभी त्याग किया जाता है? बालबोधिनी—सखी श्रीराधाको प्रलोभन दे रही है कि हे सखी राधिके ! वहाँ श्रीकृष्णके समीप पहुँचने पर तुम्हें अनेक प्रकारका केलि-कौतुक प्राप्त होगा—इस कथनसे सखी श्रीराधाकी उत्कण्ठा बढ़ाकर उन दोनोंके मनोरथका अभिव्यञ्जन कर रही है। अन्धकार हो जाने पर नायक अन्य नायिकाको तथा नायिका अन्य नायकको प्राप्त करनेके लिए यदि निकले हों और जब वे परस्पर मिलित हो जाएँ, तब जिस व्रीड़ा मिश्रित शृङ्गार रसकी अनुभूति होती है। तब ऐसा कौन-सा

पञ्चमः सर्गः- आकाङ्क्ष-पुण्डरीकाक्षः २०३ रस है, जिसे प्राप्त करना अवशिष्ट रह जाय। उस व्रीड़ा-मिश्रित रसमें सब प्रकारके रसोंका समागम हो जाता है। भ्रमात् से तात्पर्य है—कुंजकी ओर भ्रमण करते हुए परस्पर मिल गये हों, अन्धकारमें परस्पर वार्तालापसे पहचान लिये गये हों अथवा अन्य किसी प्रयोजनसे गये हों और मिल गये हों। वार्तालाप होनेसे सात्विक भावके द्वारा स्वर-भंगसे पहचान लिये गये हों। मिलनके साथ ही वे सहसा आलिंगन करते हैं, किन्तु दोनोंको भय रहता है कि कहीं किसीने देख न लिया हो। अतः 'भयानक रस' प्रादुर्भूत होता है, जिसका 'भय' स्थायी भाव है। कान्ताके बार-बार मना किये जाने पर भी नायक अपनी हठवृत्तिके कारण उसका चुम्बन करता है, दन्तक्षत करता है। पर पुनः उसे शोक होता है—मैंने व्यर्थ ही इसे कष्ट पहुँचाया, लाख मना करने पर भी माना नहीं। अतः करुणासे उनका अन्तःकरण विगलित होता है। अतः यहाँ 'करुण रस' प्राप्त होता है। कामको प्रोत्साहित करनेके लिए परस्पर नखोल्लेख करते हैं, जिसका स्थायी भाव है 'उत्साह'। तत्पश्चात् परस्पर दोनों एक दूसरेके साथ रतिक्रीड़ाके लिए तत्पर होते हैं। इस क्रीड़ामें उन्हें विस्मय-प्रधान अद्भुत रसकी सुखानुभूति होती है। तत्पश्चात् कामोद्बोध होने पर नाना विलासोंसे विलसित हो परस्पर हास्य प्रधान बातें करते हैं और तब रतिक्रीड़ामें लिप्त होने पर दोनोंको हास्य रस अनुभूत होता है। सुरत-क्रीड़ा सम्पन्न होनेपर जब वे परस्पर आनन्दका अनुभव करते हैं, तब उन्हें सकल-रस-चक्रवर्ती रसराज शृङ्गार रसकी मधुरानुभूति होती है। इस प्रकार तिमिरमें मिलित पहले अनजान, फिर परस्पर पहचान लिये जानेपर दोनोंको लज्जा होती है, परन्तु परस्पर दोषारोपण अथवा क्रोध नहीं करते, क्योंकि दोनोंका समान दोष होता

२०४ श्रीगीतगोविन्दम् है। अतःपर नायक-नायिकाओंको अन्धकारमें लज्जामिश्रित सम्पूर्ण रसोंका अनुभव होता है। राधे! तुम्हें ऐसी प्रतीति होगी कि अहो! इतने दिनोंके पश्चात् जब हम दोनों मिले, तब इतने गहरे शृङ्गार रसमें क्यों डूबे? प्रस्तुत सन्दर्भमें चौर्यरतके सम्पूर्ण क्रमको भी बतलाया गया है। भरतमुनिने कहा है- आश्लेषचुम्बननखक्षतकामबोधशीघ्रत्वमैथुनमनन्तसुखप्रबोधम् । प्रीतिस्ततोऽपि रसभावनमेव कार्यमेवं नितान्तनतुराः सुचिरं रमन्ते ॥ प्रस्तुत श्लोकमें दीपक, समुच्चय तथा भ्रान्तिमान अलङ्कार द्रष्टव्य हैं। शार्दूलविक्रीड़ित छन्द है। सभय-चकितं विन्यस्यन्तीं दृशौ तिमिरे पथि प्रतितरु मुहुः स्थित्वा मन्दं पदानि वितन्वतीम्। कथमपि रहःप्राप्तामङ्गैरनङ्ग-तरङ्गिभिः सुमुखि! सुभगः पश्यन् स त्वामुपैतु कृतार्थताम् ॥४ ॥ अन्वय-[अथैतच्छ्रवणव्यग्रतया गमनाय उद्यतामवलोक्य गमनप्रकार-माह]-अयि सुमुखि (सुवदने) सुभगः (भाग्यवान्; तव प्रणय- सौभाग्यशालीति यावत्) [हरिः] तिमिरे (तमसावृते इत्यर्थः) पथि (वर्त्मनि) प्रतितरु (प्रतिवृक्षे) सभयचकितं [यथा तथा; कुत्रचित् तिष्ठता केनचित् द्रक्ष्येऽहमिति नेत्रस्य सभयचकितत्वम्) दृशं (नेत्रं) विन्यस्यन्तीं (निक्षिपन्तीं) मुहुः (पुनः पुनः) स्थित्वा (ससाध्वसं विश्रम्य) मन्दं [यथा तथा] पदानि वितन्वर्तीं (विक्षिपन्तीं) [दौर्बल्यात् शीघ्रगमनाशक्त्या पदयोः मन्द-मन्द- विन्यासत्वम्] [अतः] कथमपि (अतिक्लशेन) रहःप्राप्तां (एकान्ते उपस्थितां) अनङ्ग-तरङ्गिभिः (कामतरङ्गपूर्णैः, उत्कण्ठया अनङ्ग-तरङ्गितवसङ्गनानाम्) अङ्गैः [उपलक्षितां] त्वां पश्यन् कृतार्थतां (साफल्यं) उपैतु (प्राप्नोतु; कृतार्थो भवतु इत्यर्थः) ॥४॥

पञ्चमः सर्गः - आकाङ्क्ष-पुण्डरीकाक्षः २०५ अनुवाद-हे शोभने! तिमिरमय पथपर भय और चकित दृष्टिसे देखती हुई, तरुवरोंके समीप खड़ी होकर पुनः शनैः-शनैः पग बढ़ाती हुई, किसी प्रकार एकान्तमें पहुँची हुई, कामकी तरंगोंसे कल्लोलित होती हुई तुम्हें देखकर सौभाग्यवान श्रीकृष्ण कृतकृत्य होंगे। बालबोधिनी-तुम्हारी प्राप्ति ही श्रीकृष्णका सर्वस्व है, इसका दिग्दर्शन करते हुए सखी श्रीराधासे कह रही है-हे अतिशय सुन्दरि ! जब तुम यहाँसे चलने लगोगी, तब तुम्हारा मार्ग अन्धकारसे परिपूर्ण होगा। उस अन्धेरे पथपर चलते हुए भयभीत होकर चकित-सी तुम आगे पैर बढ़ाओगी। अन्धकारमें भयका होना तो स्वाभाविक ही है, कहीं कोई देख न ले, अतः चकित होना भी सहज ही है। ऐसे निविड़ अन्धकारमें मैं श्रीकृष्णसे मिलनेके संकेत-स्थानपर जा रही हूँ-ऐसा विस्मय तो होगा ही, जाने पर श्रीकृष्णसे मिलन होगा या नहीं-यह शंका भी होगी। स्तन एवं नितम्ब भारसे तुम्हारा शरीर शीघ्र ही अतिशय क्लान्त हो जाता है, अतः शीघ्र जानेमें असमर्थ अलसायी-सी तुम प्रत्येक वृक्षके नीचे ठहर-ठहर कर चलना। अनङ्गकी लहरें तुम्हारे शरीर पर क्रीड़ा कर रही हैं, इस शिथिलतासे उपलक्षित संकेत स्थानपर तुम्हें देखकर शुभग श्रीकृष्ण कृतकृत्य हो जाएँगे। वे प्रसन्नताके अतिशय आवेगमें अवगाहन करने लगेंगे। प्रस्तुत श्लोकमें हरिणी छन्द तथा अतिशयोक्ति नामक अलंकार है। राधा-मुग्ध-मुखारविन्द-मधुपस्त्रैलोक्य-मौलि-स्थली नेपथ्योचित-नील-रत्नमवनी-भारावतारान्तकः । स्वच्छन्दं व्रज-सुन्दरी-जन-मनस्तोष प्रदोषोदयः कंस-ध्वंसन-धूमकेतुरवतु त्वां देवकी-नन्दनः ॥५ ॥

२०६ श्रीगीतगोविन्दम् इति श्रीगीतगोविन्दे अष्टमः सन्दर्भः इति श्रीगीतगोविन्दे महाकाव्येऽभिसारिका वर्णने साकाङ्क्षो नाम पञ्चमः सर्गः। अन्वय—[अथ विरहं वर्णयन् व्याकुलः कविः तयोर्मिथो- मिलनकाल-स्मरणजातहर्षः आशिषा सर्गमुपसंहरति] राधामुग्ध- मुखारविन्दमधुपः (राधायाः मुग्धं सुन्दरं यत् मुखारविन्दं वदनकमलं तस्य मधुपः भ्रमरः) त्रैलोक्य-मौलि-स्थली- नेपथ्योचित-नीलरत्नं (त्रैलोक्यस्य त्रिभुवनस्य या मौलिस्थली शिरोभागः श्रीवृन्दावन-भूमिरित्यर्थः तस्या नेपथ्योचितम् अलङ्कारभूतं नीलरत्नम्) अवनीभारावतारक्षमः (अवन्याः क्षितेः भारस्य अवतारे दुर्वृत्तदमनादिना हरणे क्षमः समर्थः), [तथा] व्रज-सुन्दरी-जन-मनस्तोष-प्रदोषः (व्रजसुन्दरीजनानां मनसां तोषाय प्रदोषः रजनीमुखस्वरूपः) [तथा] कंस-ध्वंसन-धूमकेतुः (कंसस्य ध्वंसने धूमकेतुः) देवकीनन्दनः त्वां चिरम् अवतु (रक्षतु) ॥ [अतएव श्रीराधाया गमनकाङ्क्षया सहितः पुण्डरीको यत्र इति सर्गोऽयं पञ्चमः] ॥५॥ अनुवाद—जो श्रीराधाजीके मनोहर मुखारविन्दका मधुपान करनेमें मधुपस्वरूप हैं, जो त्रिभुवनके मुकुटमणि-सदृश वृन्दावनधामके इन्द्रनीलमणिमय विभूषण सदृश हैं, जो अनायास प्रदोषकी भाँति ब्रजसुन्दरियोंका सन्तोष विधान करनेमें समर्थ हैं, जो पृथ्वीके भाररूपी दैत्यदानवोंका संहार करते हैं—ऐसे कंस-विध्वंसके धूमकेतु स्वरूप देवकीनन्दन श्रीकृष्ण आप सबकी रक्षा करें। बालबोधिनी—श्रीराधा और श्रीकृष्णके विरह वर्णन करनेके पश्चात् कवि दोनोंके मिलनके संभोग पक्षीय शृंगार-रसका चित्रण करते हुए पाठकों तथा श्रोताओंको आशीर्वाद प्रदान करते हुए कहते हैं कि— मुग्धमुखारविन्दमधुप—श्रीराधाका मुख कमलवत् है। जिस

पञ्चमः सर्गः-साकाङ्क्ष-पुण्डरीकाक्षः २०७ प्रकार भ्रमर कमलका सेवन करते हुए उसके पराग मधुका पान करता है, उसी प्रकार श्रीकृष्ण श्रीराधाके मुख-कमल- माधुर्यका आस्वादन करते हैं। इसलिए वे 'मुग्धमधुप' पदसे संबोधित हुए हैं। प्रस्तुत श्लोकांशसे संयोग व्यक्त हुआ है। त्रैलोक्यमौलिस्थलीनेपथ्योचितनीलरत्नः-त्रिभुवनमें किरीट स्थानीय अर्थात् सर्वोत्कृष्ट स्थानोंको विभूषित करनेवाले वे नील-रत्न हैं। नेपथ्योचितका अर्थ है 'भूषणोचित'। अवनीभारावन्तारान्तक-शिशुपाल, दन्तवक्र तथा कंस आदि पृथ्वीका भार बढ़ानेके लिए उत्पन्न हुए थे, इन्हीं 'राक्षसों' का विनाश करनेके लिए श्रीकृष्ण अवतीर्ण हुए थे। अन्तकका अर्थ है 'यम'। श्रीकृष्ण अवनीभारावन्तारोंके लिए यमके समान है। स्वच्छन्दं व्रजसुन्दरीजनमनस्तोषप्रदोषोदयः-श्रीकृष्ण व्रजसुन्दरियोंके मनोंको तोषप्रदानकारी सायंकालवत् हैं। सायंकाल होनेपर जैसे द्विजराज चन्द्रमा उदित होता है तथा कामिनियोंको अपने प्रेमियोंसे मिलनेका अवसर करता है, वैसे ही श्रीकृष्ण व्रजसुन्दरियोंके हृदयोंको स्वच्छन्दतापूर्वक आनन्द प्रदानकर उनकी अभिलाषा पूर्ण करते हैं। कंसध्वसनधूमकेतुः-कंस नामक असुरके विनाशकारी श्रीकृष्ण धूमकेतु तारेके समान हैं। धूमकेतु एक तारा विशेष है। मान्यता है कि जब यह उदित होता है, तब राजाका विनाश अवश्यम्भावी होता है। श्रीकृष्णका अवतार कंसके विनाशका सूचक है। धूमकेतुका अन्य अर्थ है-भानुके समान प्रकाशक। श्रीराधाके कामको शान्त करनेवाले श्रीकृष्ण धूमकेतु हैं। प्रदोष अर्थात् प्रगतो दोषादयः। प्रस्तुत श्लोकमें श्लेष, लुप्तोपमा, परिकर तथा वर्णोपमा

२०८ श्रीगीतगोविन्दम् नामक अलंकारोंका समावेश है। शार्दूलविक्रीड़ित छन्द तथा पाञ्चाली रीति है। इस प्रकार श्रीजयदेव प्रणीत गीतगोविन्द काव्यके अभिसारिका वर्णनमें 'साकांक्षपुण्डरीकाक्ष' नामक पाँचवाँ सर्ग पूर्ण हुआ। श्रीराधाके आगमनकी प्रतीक्षामें पुण्डरीकाक्ष विराजमान हैं—ऐसा यह पाँचवाँ सर्ग सबके प्रति आनन्ददायी हो। इति गीतिगोविन्द महाकाव्ये एकादश सन्दर्भे टीकायां बालबोधिनी वृत्ति।

षष्ठः सर्गः ‘धृष्ट-वैकुण्ठः’ अथ तां गन्तुमशक्तां चिरमनुरक्तां लतागृहे दृष्ट्वा। तच्चरितं गोविन्दे मनसिजमन्दे सखी प्राह ॥१॥ अन्वय—अथ (अनन्तरं) चिरम् अनुरक्तां (एकान्तानुरागिणीं) तां प्रियतम-वैकल्यश्रवणेन दशमीदशोन्मुखीमिव) राधां लतागृहे (कुञ्जे) [अपेक्षमाणां] [तथा सामर्थ्याभावात् स्वयं] गन्तुमशक्तां दृष्ट्वा [अति व्याकुला] सखी (दूती) मनसिजमन्दे (मनसिजेन प्रियार्त्तिश्रवणजात-मनोदुःखेन मन्दे निरुत्साहीकृते) गोविन्दे (कृष्णे) तच्चरितं (तस्याः राधायाः चरितं) प्राह। अनेन राधाया वासकसज्जावस्था प्रकटिता। तल्लक्षणो यथा—“कुरुते मण्डनं यातु सञ्जिते वास-वेश्मनि। सातु वासकसज्जा स्याद् विदित-प्रिय- सङ्गमा॥” इति साहित्यदर्पणे] ॥१॥ अनुवाद—श्रीकृष्णके पास जानेमें असमर्थ तथा चिरकालसे उनमें अनुरक्त श्रीराधाको लतागृहमें देखकर मदन-विकारसे आर्त गोविन्दसे सखीने कहा— बालबोधिनी—श्रीराधा श्रीकृष्णके प्रति प्रबल अनुरागिणी होनेपर भी विरहवेदनाजनित क्षीणताके कारण उनके सन्निकट अभिसारके लिए नहीं जा सकीं। प्रियसखी लतागृहमें राधिकाको इस स्थितिमें रखकर श्रीकृष्णके निकट जाकर उनकी चेष्टाओंका वर्णन करती है। श्रीकृष्ण मदन-सन्तापके कारण विषण्ण चित्तसे बैठे हुए हैं। अतएव उनकी गति मन्द पड़ गयी है। श्रीराधा श्रीगोविन्दमें अनुरक्ता हैं। लतागृहसे संकेतस्थलका तात्पर्य है। प्रस्तुत श्लोकमें आर्या छन्द है।

“हे हरि, राधा आवास गृहे— पल-पल दिशि दिशि देख रही है।”

षष्ठः सर्गः—धृष्ट-वैकुण्ठः २११ द्वादशः सन्दर्भः। गीतम् ॥१२ ॥ गुणकरी रागेण रूपकतालेन गीयते। यह बारहवाँ प्रबन्ध गुणकरी राग तथा रूपक तालद्वारा गाया जाता है। पश्यति दिशि दिशि रहसि भवन्तम्। तदधर-मधुर-मधूनि पिवन्तम् ॥ नाथ हरे! सीदति राधाऽऽवासगृहे ॥१ ॥ध्रुवपदम् अन्वय—[राधा] रहसि (एकान्ते) दिशि दिशि (प्रतिदिशं) तदधरमधुर-मधूनि (तस्याः एव राधायाः अधरस्य मधुराणि मधूनि) पिवन्तं भवन्तं पश्यति; हे नाथ हरे, [त्वयि अनुरक्ततया सन्ताप एवानुभूतस्तया इति नाथशब्दः, त्वया च तस्या लज्जाधैर्यादि-हरणात् हरिशब्दोऽपि प्रयुक्तः] राधा वासगृहे (सङ्केतभवने) सीदति (त्वदागमनप्रतीक्षया क्रमशः अवसन्ना भवति) [त्वन्मयं जगत् प्रतिभाति तस्याः तथापि त्वं मनसापि तां न स्मरसीति सन्तापकत्वमेवेत्यर्थः] ॥१ ॥ अनुवाद—हे नाथ ! हे हरे ! श्रीराधा अपने आवास गृहमें सीझ रही हैं, अत्यन्त दुःखी हो रही हैं, स्वाधरके मधुर सुधापानमें सकुशल आपको मन-ही-मन सकल दिशाओंमें देख रही हैं। पद्यानुवाद— पल-पल दिशि दिशि देख रही है मधुर अधर रस पीते, कहाँ दूर हो, कहाँ निकट हो हे मेरे मनचीते ? हे हरि, राधा आवास गृहे कब तक वियोगका त्रास सहे ॥ बालबोधिनी—श्रीराधाकी चेष्टाओंका वर्णन करती हुई

२१२ श्रीगीतगोविन्दम् सखी कहती है—हे श्रीकृष्ण! श्रीराधा आवासगृहमें अर्थात् संकेतस्थान पर अवसादको प्राप्त हो रही हैं। एकान्तमें बैठी हुई वह प्रत्येक दिशाओंमें अपनी भावनाकी तीव्र प्रबलतासे सर्वत्र आपको देख रही हैं। सभी दिशाएँ उनके लिए कृष्णमयी हो गयी हैं। लता-गृहमें आपके चरित्रकी मधुर-मधुर बातोंका वह सप्रेम श्रवण-पान कर रही हैं—ऐसा अर्थ भी किया जा सकता है। चिरकालीन प्रेमकी प्रकृति ही ऐसी होती है कि मन और शरीरमें तालमेल नहीं रहता, मन कुछ करना चाहता है, पर शरीर साथ नहीं देता। निढाल पड़ी हैं वह। त्वदभिसरण-रभसेन वलन्ती। पतति पदानि कियन्ति चलन्ती— नाथ हरे! सीदति... ॥२॥ अन्वय—[यद्येतादृशी सा तर्हि कथं ना गच्छतीत्याह]— त्वदभिसरण-रभसेन (तव अभिसरणे यः रभसः उत्साहः हर्षो वा तेन) वलन्ती (उत्सहमाना वलयुक्ता वा) [सती] कियन्ति पदानि चलन्ती [सामर्थ्याभावात् मूर्च्छिता] पतति [अतः स्वयमागन्तुमसमर्था] हे नाथ....एवं सर्वत्र] ॥२॥ अनुवाद—श्रीराधा अपने अभिसरणके उत्साहसे उत्सुक हो प्रसाधनादि कार्योंमें व्यस्त होती हुई ज्यों ही कुछ कदम चलती हैं, त्यों ही गिर जाती हैं। पद्यानुवाद— यह कहकर तुमसे मिलनेको, ज्यों व्याकुल हो बढ़ती। गिर पड़ती है पथमें क्षणमें, क्षणमें है उठ पड़ती॥ हे हरि राधा आवास गृहे। कब तक वियोगका वास गृहे॥

षष्ठः सर्गः—धृष्ट-वैकुण्ठः २१३ बालबोधिनी—हे श्रीकृष्ण ! प्रसाधनादि कार्योंमें लगी हुई श्रीराधा अभिसार करनेके लिए बड़े वेगसे उठती हैं, किन्तु विरहमें अत्यन्त क्षीण होनेके कारण विवश होकर वह कुछ ही कदम चलकर भूमिपर मूर्च्छित होकर गिर जाती हैं। विहित-विशद-विस-किसलय-वलया। जीवति परमिह तव रति-कलया— नाथ हरे! सीदति... ॥३॥ अन्वय—[कथं तर्हि जीवतीत्याह]—विहित-विशदविस- किशलय-वलया (विहितं कृतं विशदविसानां शुभ्रमृणालानां किसलयानाञ्च वलयं यया तादृशी) [सती] परं (केवलं) तव रतिकलया (रमणावेशेन) इह जीवति ॥३॥ अनुवाद—विमल-धवल मृणाल एवं नव-पल्लव विरचित वलय-समूहको पहने वह केवल आपके साथ रमण करनेकी इच्छासे जी रही हैं। पद्यानुवाद— किसलय कोमल वलय धार कर रति-चिन्ता-रस साने। बालबोधिनी—मृणालके सूत्रोंसे और उसकी कोपलोंसे श्रीराधाने स्वयंको वलयित कर लिया है, जिससे कामजन्य संतापसे मुक्ति मिले। अतिशय क्षीण और कृशा होनेपर भी आपके साथ रमण करनेकी इच्छासे आनन्दित होकर उन्होंने अभी तक प्राणोंको धारण कर रखा है। तुम्हारे प्रेमकी विधि अभी भी उनके प्राणोंमें बसी है। तुम्हारे प्रेमका एक पूरा तन्त्र प्राणकी तन्त्रीमें बज रहा है। रमणका आवेश ही उनके प्राण धारणका कारण है। मुहुरवलोकित-मण्डन-लीला । मधुरिपुरहमिति भावन-शीला— नाथ हरे! सीदति... ॥४॥

२१४ श्रीगीतगोविन्दम् अन्वय—[तत्प्रकारमेवाह—मुहुः (पुनः पुनः) [स्वस्मिन्नेव] अवलोकित-मण्डनलीला (अवलोकिता तवैव मण्डनस्य बर्हगुञ्जादिभूषणस्य लीला विलासो यया सा) [अतएव] अहं मधुरिपुः (श्रीकृष्णः) इति भावनशीला (भावनपरा; कृष्ण एवाहमिति चिन्तनपरा इति भावः)॥४॥ अनुवाद—'मैं ही मधुरिपु हूँ' इस प्रकारकी भावनामयी होकर वह मुहुःमुहुः आपके आभूषणों और अलंकरणोंको देखती हैं। पद्यानुवाद— कभी रचाती रास मुग्ध हो, माधव निज अनुमाने। हे हरि राधा आवास गृहे, कब तक वियोगका त्रास सहे? बालबोधिनी—हे श्रीकृष्ण ! आपके साथ एकप्राण हो 'मैं ही मधुसूदन हूँ, मैं ही श्रीराधाप्राण श्रीकृष्ण हूँ, ऐसी भावना करती हुई स्वयंमें आपका आरोपण कर लेती हैं, तद्रूप हो जाती हैं। ये मुकुट, कुण्डल, वनमाला आदि अलङ्कार श्रीराधाके साथ रमण करने योग्य हैं—इस भावनासे पुनः पुनः उन अलङ्कारोंको धारण करती हैं। स्त्री-योग्य आभूषणोंको छोड़कर तुम्हारे विरहके दुःखसे पुरुषायित सुरत योग्य आभूषणोंको धारण करती हुई तद्रूपताको प्राप्त हुई वह अपना समय बिताती हैं। वह माधव बनकर श्रीराधाका शृङ्गार देखती हैं। त्वरितमुपैति न कथमभिसारम्। हरिरिति वदति सखीमनुवारम्— नाथ हरे! सीदति... ॥५ ॥ अन्वय—[पुनः स्फूर्त्त्यपगमेतु आत्मानं पृथङ्मत्वा] हरिः

षष्ठः सर्गः—धृष्ट-वैकुण्ठः २१५ कथं त्वरितम् अभिसारं (सङ्केतस्थानं) न उपैति (आगच्छति) इति अनुवारं (पुनः पुनः) सखीं (मां) वदति (पृच्छति) ॥५॥ अनुवाद—बार-बार अपनी सखीसे पूछती हैं—सखि! श्रीकृष्ण अभिसरणके लिए शीघ्र ही क्यों नहीं आते? पद्यानुवाद— बार-बार कहती है 'सखि! कब आयेंगे वनमाली?' बालबोधिनी—सखी श्रीकृष्णसे कहती है—हे श्रीकृष्ण! कभी-कभी तो ऐसा होता है कि श्रीराधा बार-बार मेरे सामने आती हैं और यही पूछती हैं—श्रीहरि इस संकेत स्थान पर मुझसे मिलनेके लिए त्वरित क्यों नहीं आते? श्लिष्यति चुम्बति जलधर-कल्पम्। हरिरुपगत इति तिमिरमनल्पम्— नाथ हरे! सीदति... ॥६॥ अन्वय—[पुनश्च अत्यावेशेन] हरिः उपगतः (आयातः) इति [बुद्ध्वा] जलधर-कल्पं (मेघसदृशं) अनल्पं (प्रगाढं) तिमिरं (अन्धकारं) श्लिष्यति (आलिङ्गति) चुम्बति च ॥६॥ अनुवाद—जलधरके समान प्रतीत होनेवाले घने अन्धकारको “हरि आ गये”—ऐसा समझकर आलिङ्गन और चुम्बन करती हैं। पद्यानुवाद— जान जलद सम तम को—“तुम हो” फूल उठी मतवाली। करने लगी उसीका चुम्बन, आलिङ्गन मधुमाती ॥ बालबोधिनी—जब वह कुछ जलभरे मेघके समान स्निग्ध नीलकान्तिवाले विपुल अन्धकारको देखती हैं तो उन्हें लगता है—‘श्रीकृष्ण, तुम आ गये हो' और उस स्निग्ध अंधकारको ही अङ्कमें भर लेती हैं और चुम्बन करने लगती हैं।

२१६ श्रीगीतगोविन्दम् भवति विलम्बिनि विगलित-लज्जा। विलपति रोदिति वासक-सज्जा- नाथ हरे! सीदति... ॥७॥ अन्वय-[पुनस्तदपगमे] भवति (त्वयि) विलम्बिनि (कृतविलम्बे) वासकसज्जा (वासक-सज्जावस्थां प्राप्ता; सज्जित- विलासगृहा इत्यर्थः) [सा] विगलित-लज्जा (विगलिता लज्जा यस्याः तादृशी सती) विलपति रोदिति च॥७॥ अनुवाद-जब श्रीराधाको बाह्यज्ञान होता है कि आप वह नहीं हैं, आप आनेमें देर कर रहे हैं, तो वह वासकसज्जा श्रीराधा लाज खोकर विलखने लगती हैं, रोने लगती हैं। पद्यानुवाद- लख विलम्ब वह वासकसज्जा, लज्जा खो तन-छीनी। रोती और विलपती रहती, कवि 'जय'की यह वाणी॥ बालबोधिनी-श्रीराधा वासकसज्जा नायिकाके रूपमें यहाँ निरूपित हुई हैं। जब श्रीराधा यह जान लेती हैं कि मैं जिसको आलिङ्गनकर चूम रही हूँ, वह श्रीकृष्ण नहीं प्रत्युत घना अन्धकार है तो वह अपने कृत्य पर लज्जित हो रोने-कलपने लगती हैं। उनकी बेसुधी ऐसी है कि आसपासके अंधकारके प्रसारको ही वह वर्ण-भ्रान्तिसे अपना प्रियतम मान लेती हैं। और फिर मेरे प्रियतम अभी तक क्यों नहीं आये कहकर बिलखने लगती हैं। वासकसज्जा-जो नायिका संकेत-कुञ्जमें उपस्थित होकर बड़े उत्साहसे नायककी प्रतीक्षा करती हुई कुञ्जको और उसमें पुष्प-शय्याको तथा स्वयंको सजाती हैं तथा नायकके पास बारम्बार दूतीको भेजती हैं, उसे वासकसज्जा नायिका कहते हैं।

षष्ठः सर्गः—धृष्ट-वैकुण्ठः २१७ श्रीजयदेव-कवेरिदमुदितम् । रसिकजनं तनुतामतिमुदितम्— नाथ हरे! सीदति... ॥८॥ अन्वय—श्रीजयदेव-कवेः उदितम् (उक्तम्) इदं [शृङ्गार-रस भावितान्तःकरणं] रसिकजनम् अतिमुदितं (अतिप्रीतं) तनुताम् (कुरुताम्)। [एतेन शृङ्गार-रसाविष्टैर्भक्तैरेव श्रीजयदेवोक्तवचन- मास्वादनीयमित्युक्तम्] ॥८॥ अनुवाद—श्रीजयदेव कवि द्वारा रचित इस गानसे रसिक जनोंके हृदयमें अतिशय हर्षका उदय हो। पद्यानुवाद— सुनते हैं जो जन इस जगमें, पाते गति कल्याणी ॥ हे हरि राधा आवास गृहे, कब तक वियोगका त्रास सहे? बालबोधिनी—कवि जयदेव कहते हैं कि सखीने जो श्रीराधाकी चेष्टा निवेदन-विषयक गीत गाया है, वह गीत शृंगार-रस द्वारा विभावित चित्तमय रसिक भक्तोंको अतिशय आनन्द प्रदान करे। प्रस्तुत गीतमें शृंगार-रसके विप्रलम्भ भाव-रसका चित्रण है। समुच्चय स्वर है। शठ नायक है। चिन्तासे व्याकुल होनेवाली वासकसज्जा नायिका है। विपुल-पुलक-पालिः स्फीत-सीत्कारमन्त- र्जनितजड़िमु काकु-व्याकुलं व्याहरन्ती। तव कितव! विधायामन्द-कन्दर्प-चिन्तां रस-जलनिधि-मग्ना ध्यानलग्ना मृगाक्षी ॥१॥ अन्वय—[स्व-सख्यार्त्ति-स्मरणेन व्याकुला सा सेर्षमिव पुनराह]—हे कितव (धूर्त्त; गतप्राणामिव तां वनमानीय निश्चिन्तोऽसीति धूर्त्ततया सम्बोधनम्) विपुल-पुलक-पालिः

२१८ श्रीगीतगोविन्दम् (विपुला महती पुलकानां रोमाञ्चानां पालिः पङ्क्ति यस्याः तवाङ्ग-स्पर्श-चिन्तनेन सञ्जातरोमाञ्चा इत्यर्थः) स्फीत-शीत्कारं (स्फीतः प्रवृद्धः शीत्कारः तव दशन-क्षतादि-कल्पनेन जनित इति भावः यत्र तद् यथा स्यात् तथा) अन्तः (अभ्यन्तरे) जनित-जड़िम-काकु-व्याकुलं (जनितो योऽसौ जड़िमा जाड्यम् अस्फुटत्वमित्यर्थः तेन जाता या काकुः तया काक्वा ध्वनेर्विकारेण परिरम्भण-चुम्बनादि-स्मरण-जनितेन इति भावः व्याकुलं यथास्यात् तथा) व्याहरन्ती (ब्रुवती) सा मृगाक्षी (मृगनयना, मृगी इव सरलचित्ता इत्यभिप्रायः) अमन्द-कन्दर्प- चिन्तां (अमन्दा गाढ़ा या कन्दर्पचिन्ता कामचिन्ता तां) विधाय (परिकल्प्य) तव रस-जलधि-निमग्ना (रस-जलधौ शृङ्गार-रस-सागरे निमग्ना; एतेन आलम्बनं बिना कथं सा जीवतीति अर्थात् ज्ञेयम्; समुद्रमग्ना यथा काष्ठमवलम्बते तथा इयमपि उपायान्तराभावात् त्वयि एव) ध्यानलग्ना (ध्याने तव चिन्तने लग्ना च) [वर्त्तते इति शेषः] ॥१॥ अनुवाद—हे शठ! अति रोमांचसे युक्त, अन्तर्जनित जड़ता एवं काकुध्वनि द्वारा स्पष्ट रूपसे सीत्कार करती हुई वह मृगाक्षी राधिका आपके अतिशय तीव्र मदन-विकारके आवेशमें आपके प्रेम-रस सागरमें निमज्जित हो किसी प्रकार प्राण धारण करती है। पद्यानुवाद— विपुल पुलक तन, अतुल ललक मन, ध्यान सुरति सुख-लीना। मिलन कल्पना रस-सागरमें डूब रही मति दीना ॥ बालबोधिनी—श्रीराधाके प्रेमोन्मादका-कन्दर्पोन्मादका चित्रण करती हुई सखी कहती है—हे शठ! हे धूर्त! हे कपटी! वह