गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)
Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary
महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२१२ श्रीगीतगोविन्दम् सखी कहती है—हे श्रीकृष्ण! श्रीराधा आवासगृहमें अर्थात् संकेतस्थान पर अवसादको प्राप्त हो रही हैं। एकान्तमें बैठी हुई वह प्रत्येक दिशाओंमें अपनी भावनाकी तीव्र प्रबलतासे सर्वत्र आपको देख रही हैं। सभी दिशाएँ उनके लिए कृष्णमयी हो गयी हैं। लता-गृहमें आपके चरित्रकी मधुर-मधुर बातोंका वह सप्रेम श्रवण-पान कर रही हैं—ऐसा अर्थ भी किया जा सकता है। चिरकालीन प्रेमकी प्रकृति ही ऐसी होती है कि मन और शरीरमें तालमेल नहीं रहता, मन कुछ करना चाहता है, पर शरीर साथ नहीं देता। निढाल पड़ी हैं वह। त्वदभिसरण-रभसेन वलन्ती। पतति पदानि कियन्ति चलन्ती— नाथ हरे! सीदति... ॥२॥ अन्वय—[यद्येतादृशी सा तर्हि कथं ना गच्छतीत्याह]— त्वदभिसरण-रभसेन (तव अभिसरणे यः रभसः उत्साहः हर्षो वा तेन) वलन्ती (उत्सहमाना वलयुक्ता वा) [सती] कियन्ति पदानि चलन्ती [सामर्थ्याभावात् मूर्च्छिता] पतति [अतः स्वयमागन्तुमसमर्था] हे नाथ....एवं सर्वत्र] ॥२॥ अनुवाद—श्रीराधा अपने अभिसरणके उत्साहसे उत्सुक हो प्रसाधनादि कार्योंमें व्यस्त होती हुई ज्यों ही कुछ कदम चलती हैं, त्यों ही गिर जाती हैं। पद्यानुवाद— यह कहकर तुमसे मिलनेको, ज्यों व्याकुल हो बढ़ती। गिर पड़ती है पथमें क्षणमें, क्षणमें है उठ पड़ती॥ हे हरि राधा आवास गृहे। कब तक वियोगका वास गृहे॥