गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)
Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary
महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंषष्ठः सर्गः—धृष्ट-वैकुण्ठः २१३ बालबोधिनी—हे श्रीकृष्ण ! प्रसाधनादि कार्योंमें लगी हुई श्रीराधा अभिसार करनेके लिए बड़े वेगसे उठती हैं, किन्तु विरहमें अत्यन्त क्षीण होनेके कारण विवश होकर वह कुछ ही कदम चलकर भूमिपर मूर्च्छित होकर गिर जाती हैं। विहित-विशद-विस-किसलय-वलया। जीवति परमिह तव रति-कलया— नाथ हरे! सीदति... ॥३॥ अन्वय—[कथं तर्हि जीवतीत्याह]—विहित-विशदविस- किशलय-वलया (विहितं कृतं विशदविसानां शुभ्रमृणालानां किसलयानाञ्च वलयं यया तादृशी) [सती] परं (केवलं) तव रतिकलया (रमणावेशेन) इह जीवति ॥३॥ अनुवाद—विमल-धवल मृणाल एवं नव-पल्लव विरचित वलय-समूहको पहने वह केवल आपके साथ रमण करनेकी इच्छासे जी रही हैं। पद्यानुवाद— किसलय कोमल वलय धार कर रति-चिन्ता-रस साने। बालबोधिनी—मृणालके सूत्रोंसे और उसकी कोपलोंसे श्रीराधाने स्वयंको वलयित कर लिया है, जिससे कामजन्य संतापसे मुक्ति मिले। अतिशय क्षीण और कृशा होनेपर भी आपके साथ रमण करनेकी इच्छासे आनन्दित होकर उन्होंने अभी तक प्राणोंको धारण कर रखा है। तुम्हारे प्रेमकी विधि अभी भी उनके प्राणोंमें बसी है। तुम्हारे प्रेमका एक पूरा तन्त्र प्राणकी तन्त्रीमें बज रहा है। रमणका आवेश ही उनके प्राण धारणका कारण है। मुहुरवलोकित-मण्डन-लीला । मधुरिपुरहमिति भावन-शीला— नाथ हरे! सीदति... ॥४॥