गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)
Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary
महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२१४ श्रीगीतगोविन्दम् अन्वय—[तत्प्रकारमेवाह—मुहुः (पुनः पुनः) [स्वस्मिन्नेव] अवलोकित-मण्डनलीला (अवलोकिता तवैव मण्डनस्य बर्हगुञ्जादिभूषणस्य लीला विलासो यया सा) [अतएव] अहं मधुरिपुः (श्रीकृष्णः) इति भावनशीला (भावनपरा; कृष्ण एवाहमिति चिन्तनपरा इति भावः)॥४॥ अनुवाद—'मैं ही मधुरिपु हूँ' इस प्रकारकी भावनामयी होकर वह मुहुःमुहुः आपके आभूषणों और अलंकरणोंको देखती हैं। पद्यानुवाद— कभी रचाती रास मुग्ध हो, माधव निज अनुमाने। हे हरि राधा आवास गृहे, कब तक वियोगका त्रास सहे? बालबोधिनी—हे श्रीकृष्ण ! आपके साथ एकप्राण हो 'मैं ही मधुसूदन हूँ, मैं ही श्रीराधाप्राण श्रीकृष्ण हूँ, ऐसी भावना करती हुई स्वयंमें आपका आरोपण कर लेती हैं, तद्रूप हो जाती हैं। ये मुकुट, कुण्डल, वनमाला आदि अलङ्कार श्रीराधाके साथ रमण करने योग्य हैं—इस भावनासे पुनः पुनः उन अलङ्कारोंको धारण करती हैं। स्त्री-योग्य आभूषणोंको छोड़कर तुम्हारे विरहके दुःखसे पुरुषायित सुरत योग्य आभूषणोंको धारण करती हुई तद्रूपताको प्राप्त हुई वह अपना समय बिताती हैं। वह माधव बनकर श्रीराधाका शृङ्गार देखती हैं। त्वरितमुपैति न कथमभिसारम्। हरिरिति वदति सखीमनुवारम्— नाथ हरे! सीदति... ॥५ ॥ अन्वय—[पुनः स्फूर्त्त्यपगमेतु आत्मानं पृथङ्मत्वा] हरिः