गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)
Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary
महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा
२१४ श्रीगीतगोविन्दम् अन्वय—[तत्प्रकारमेवाह—मुहुः (पुनः पुनः) [स्वस्मिन्नेव] अवलोकित-मण्डनलीला (अवलोकिता तवैव मण्डनस्य बर्हगुञ्जादिभूषणस्य लीला विलासो यया सा) [अतएव] अहं मधुरिपुः (श्रीकृष्णः) इति भावनशीला (भावनपरा; कृष्ण एवाहमिति चिन्तनपरा इति भावः)॥४॥ अनुवाद—'मैं ही मधुरिपु हूँ' इस प्रकारकी भावनामयी होकर वह मुहुःमुहुः आपके आभूषणों और अलंकरणोंको देखती हैं। पद्यानुवाद— कभी रचाती रास मुग्ध हो, माधव निज अनुमाने। हे हरि राधा आवास गृहे, कब तक वियोगका त्रास सहे? बालबोधिनी—हे श्रीकृष्ण ! आपके साथ एकप्राण हो 'मैं ही मधुसूदन हूँ, मैं ही श्रीराधाप्राण श्रीकृष्ण हूँ, ऐसी भावना करती हुई स्वयंमें आपका आरोपण कर लेती हैं, तद्रूप हो जाती हैं। ये मुकुट, कुण्डल, वनमाला आदि अलङ्कार श्रीराधाके साथ रमण करने योग्य हैं—इस भावनासे पुनः पुनः उन अलङ्कारोंको धारण करती हैं। स्त्री-योग्य आभूषणोंको छोड़कर तुम्हारे विरहके दुःखसे पुरुषायित सुरत योग्य आभूषणोंको धारण करती हुई तद्रूपताको प्राप्त हुई वह अपना समय बिताती हैं। वह माधव बनकर श्रीराधाका शृङ्गार देखती हैं। त्वरितमुपैति न कथमभिसारम्। हरिरिति वदति सखीमनुवारम्— नाथ हरे! सीदति... ॥५ ॥ अन्वय—[पुनः स्फूर्त्त्यपगमेतु आत्मानं पृथङ्मत्वा] हरिः
षष्ठः सर्गः—धृष्ट-वैकुण्ठः २१५ कथं त्वरितम् अभिसारं (सङ्केतस्थानं) न उपैति (आगच्छति) इति अनुवारं (पुनः पुनः) सखीं (मां) वदति (पृच्छति) ॥५॥ अनुवाद—बार-बार अपनी सखीसे पूछती हैं—सखि! श्रीकृष्ण अभिसरणके लिए शीघ्र ही क्यों नहीं आते? पद्यानुवाद— बार-बार कहती है 'सखि! कब आयेंगे वनमाली?' बालबोधिनी—सखी श्रीकृष्णसे कहती है—हे श्रीकृष्ण! कभी-कभी तो ऐसा होता है कि श्रीराधा बार-बार मेरे सामने आती हैं और यही पूछती हैं—श्रीहरि इस संकेत स्थान पर मुझसे मिलनेके लिए त्वरित क्यों नहीं आते? श्लिष्यति चुम्बति जलधर-कल्पम्। हरिरुपगत इति तिमिरमनल्पम्— नाथ हरे! सीदति... ॥६॥ अन्वय—[पुनश्च अत्यावेशेन] हरिः उपगतः (आयातः) इति [बुद्ध्वा] जलधर-कल्पं (मेघसदृशं) अनल्पं (प्रगाढं) तिमिरं (अन्धकारं) श्लिष्यति (आलिङ्गति) चुम्बति च ॥६॥ अनुवाद—जलधरके समान प्रतीत होनेवाले घने अन्धकारको “हरि आ गये”—ऐसा समझकर आलिङ्गन और चुम्बन करती हैं। पद्यानुवाद— जान जलद सम तम को—“तुम हो” फूल उठी मतवाली। करने लगी उसीका चुम्बन, आलिङ्गन मधुमाती ॥ बालबोधिनी—जब वह कुछ जलभरे मेघके समान स्निग्ध नीलकान्तिवाले विपुल अन्धकारको देखती हैं तो उन्हें लगता है—‘श्रीकृष्ण, तुम आ गये हो' और उस स्निग्ध अंधकारको ही अङ्कमें भर लेती हैं और चुम्बन करने लगती हैं।
२१६ श्रीगीतगोविन्दम् भवति विलम्बिनि विगलित-लज्जा। विलपति रोदिति वासक-सज्जा- नाथ हरे! सीदति... ॥७॥ अन्वय-[पुनस्तदपगमे] भवति (त्वयि) विलम्बिनि (कृतविलम्बे) वासकसज्जा (वासक-सज्जावस्थां प्राप्ता; सज्जित- विलासगृहा इत्यर्थः) [सा] विगलित-लज्जा (विगलिता लज्जा यस्याः तादृशी सती) विलपति रोदिति च॥७॥ अनुवाद-जब श्रीराधाको बाह्यज्ञान होता है कि आप वह नहीं हैं, आप आनेमें देर कर रहे हैं, तो वह वासकसज्जा श्रीराधा लाज खोकर विलखने लगती हैं, रोने लगती हैं। पद्यानुवाद- लख विलम्ब वह वासकसज्जा, लज्जा खो तन-छीनी। रोती और विलपती रहती, कवि 'जय'की यह वाणी॥ बालबोधिनी-श्रीराधा वासकसज्जा नायिकाके रूपमें यहाँ निरूपित हुई हैं। जब श्रीराधा यह जान लेती हैं कि मैं जिसको आलिङ्गनकर चूम रही हूँ, वह श्रीकृष्ण नहीं प्रत्युत घना अन्धकार है तो वह अपने कृत्य पर लज्जित हो रोने-कलपने लगती हैं। उनकी बेसुधी ऐसी है कि आसपासके अंधकारके प्रसारको ही वह वर्ण-भ्रान्तिसे अपना प्रियतम मान लेती हैं। और फिर मेरे प्रियतम अभी तक क्यों नहीं आये कहकर बिलखने लगती हैं। वासकसज्जा-जो नायिका संकेत-कुञ्जमें उपस्थित होकर बड़े उत्साहसे नायककी प्रतीक्षा करती हुई कुञ्जको और उसमें पुष्प-शय्याको तथा स्वयंको सजाती हैं तथा नायकके पास बारम्बार दूतीको भेजती हैं, उसे वासकसज्जा नायिका कहते हैं।
षष्ठः सर्गः—धृष्ट-वैकुण्ठः २१७ श्रीजयदेव-कवेरिदमुदितम् । रसिकजनं तनुतामतिमुदितम्— नाथ हरे! सीदति... ॥८॥ अन्वय—श्रीजयदेव-कवेः उदितम् (उक्तम्) इदं [शृङ्गार-रस भावितान्तःकरणं] रसिकजनम् अतिमुदितं (अतिप्रीतं) तनुताम् (कुरुताम्)। [एतेन शृङ्गार-रसाविष्टैर्भक्तैरेव श्रीजयदेवोक्तवचन- मास्वादनीयमित्युक्तम्] ॥८॥ अनुवाद—श्रीजयदेव कवि द्वारा रचित इस गानसे रसिक जनोंके हृदयमें अतिशय हर्षका उदय हो। पद्यानुवाद— सुनते हैं जो जन इस जगमें, पाते गति कल्याणी ॥ हे हरि राधा आवास गृहे, कब तक वियोगका त्रास सहे? बालबोधिनी—कवि जयदेव कहते हैं कि सखीने जो श्रीराधाकी चेष्टा निवेदन-विषयक गीत गाया है, वह गीत शृंगार-रस द्वारा विभावित चित्तमय रसिक भक्तोंको अतिशय आनन्द प्रदान करे। प्रस्तुत गीतमें शृंगार-रसके विप्रलम्भ भाव-रसका चित्रण है। समुच्चय स्वर है। शठ नायक है। चिन्तासे व्याकुल होनेवाली वासकसज्जा नायिका है। विपुल-पुलक-पालिः स्फीत-सीत्कारमन्त- र्जनितजड़िमु काकु-व्याकुलं व्याहरन्ती। तव कितव! विधायामन्द-कन्दर्प-चिन्तां रस-जलनिधि-मग्ना ध्यानलग्ना मृगाक्षी ॥१॥ अन्वय—[स्व-सख्यार्त्ति-स्मरणेन व्याकुला सा सेर्षमिव पुनराह]—हे कितव (धूर्त्त; गतप्राणामिव तां वनमानीय निश्चिन्तोऽसीति धूर्त्ततया सम्बोधनम्) विपुल-पुलक-पालिः
२१८ श्रीगीतगोविन्दम् (विपुला महती पुलकानां रोमाञ्चानां पालिः पङ्क्ति यस्याः तवाङ्ग-स्पर्श-चिन्तनेन सञ्जातरोमाञ्चा इत्यर्थः) स्फीत-शीत्कारं (स्फीतः प्रवृद्धः शीत्कारः तव दशन-क्षतादि-कल्पनेन जनित इति भावः यत्र तद् यथा स्यात् तथा) अन्तः (अभ्यन्तरे) जनित-जड़िम-काकु-व्याकुलं (जनितो योऽसौ जड़िमा जाड्यम् अस्फुटत्वमित्यर्थः तेन जाता या काकुः तया काक्वा ध्वनेर्विकारेण परिरम्भण-चुम्बनादि-स्मरण-जनितेन इति भावः व्याकुलं यथास्यात् तथा) व्याहरन्ती (ब्रुवती) सा मृगाक्षी (मृगनयना, मृगी इव सरलचित्ता इत्यभिप्रायः) अमन्द-कन्दर्प- चिन्तां (अमन्दा गाढ़ा या कन्दर्पचिन्ता कामचिन्ता तां) विधाय (परिकल्प्य) तव रस-जलधि-निमग्ना (रस-जलधौ शृङ्गार-रस-सागरे निमग्ना; एतेन आलम्बनं बिना कथं सा जीवतीति अर्थात् ज्ञेयम्; समुद्रमग्ना यथा काष्ठमवलम्बते तथा इयमपि उपायान्तराभावात् त्वयि एव) ध्यानलग्ना (ध्याने तव चिन्तने लग्ना च) [वर्त्तते इति शेषः] ॥१॥ अनुवाद—हे शठ! अति रोमांचसे युक्त, अन्तर्जनित जड़ता एवं काकुध्वनि द्वारा स्पष्ट रूपसे सीत्कार करती हुई वह मृगाक्षी राधिका आपके अतिशय तीव्र मदन-विकारके आवेशमें आपके प्रेम-रस सागरमें निमज्जित हो किसी प्रकार प्राण धारण करती है। पद्यानुवाद— विपुल पुलक तन, अतुल ललक मन, ध्यान सुरति सुख-लीना। मिलन कल्पना रस-सागरमें डूब रही मति दीना ॥ बालबोधिनी—श्रीराधाके प्रेमोन्मादका-कन्दर्पोन्मादका चित्रण करती हुई सखी कहती है—हे शठ! हे धूर्त! हे कपटी! वह
षष्ठः सर्गः—धृष्ट-वैकुण्ठः २१९ मृगनयनी राधिका तुम्हारे संश्लेष-आश्लेषके रस-सिन्धुमें डूबती हुई ध्यान-परायण हो गयी है, तुम्हारे ध्यानमें मग्न हो गयी है। उनको प्रतीत होता है कि तुमने उसे आलिंगित कर रखा है। इसलिए उनके शरीरके रोम-रोममें आनन्द हो गया है। आनन्दातिशयताके कारण वह विपुल रोमाञ्चित हो गयी है और सिसकारती हुई अन्तर-जाड्यके कारण कुछ-कुछ अस्फुट बोलती है, अपने भीतर कामके तीव्र आवेशको समेटे वह आनन्द-जलधिमें डूब-उतर रही है। प्रस्तुत श्लोकमें मालिनी छन्द तथा रसवदलंकार है। अङ्गेष्वाभरणं करोति बहुशः पत्रेऽपि सञ्चारिणि प्राप्तं त्वां परिशङ्कते वितनुते शय्यां चिरं ध्यायति। इत्याकल्प-विकल्प-तल्प-रचना-सङ्कल्पलीला-शत- व्यासक्तापि विना त्वया वरतनुर्नैषा निशां नेष्यति ॥२॥ अन्वय—[पुनरतिशीघ्रगमनाय तस्या वासकसज्जा-चेष्टितमाह] —[श्रीकृष्णो मामेवं पश्यन् मन्दमना भविष्यतीति तव अनुरञ्जनाय] एषा वरतनुः (वराङ्गी) अङ्गेषु बहुशः आभरणं करोति (परिधत्ते); [अनागत इति त्यजति च पुनरपि करोति—अनेन भूषण-बाहुल्यमित्याकल्पः]; पत्रे सञ्चारिणि अपि (पक्ष्यादिना चलति सति) त्वां प्राप्तं (आगतं) परिशङ्कते (तर्कयति) [अनेन विकल्पः]; [आगता कृष्णः अत्र शयिष्यते इति] शय्यां वितनुते (परिपाट्येन विचरयति) [अनेन तल्परचना]; चिरं ध्यायति (तव सङ्ग्मरसं चिन्तयतिच) [अनेन सङ्कल्प- लीलाशतम्]; इति (एवंरूपेण) आकल्प-विकल्प-तल्परचना- सङ्कल्प-लीलाशत-व्यासक्तापि (आकल्पस्य भूषणस्य, विकल्पस्य वितर्कस्य, तल्पस्य शय्यायाश्च रचनायां तथा सङ्कल्पलीलाशतेषु परिकल्पित-विलाससमूहेषु व्यासक्तापि विनिवेशितचित्तापि) त्वया बिना निशां न नेष्यति (न यापयिष्यति)। [विरहव्याकुलया स्तस्या रात्रियापनमधुना सुदुष्करमिति भावः] ॥२॥
२२० श्रीगीतगोविन्दम् अनुवाद—वरतनु श्रीराधा कई बार अपने अंगोंमें अलङ्कार धारण करती हैं, पत्तोंके संचरित होनेपर 'आप आ गये हैं'—इस प्रकारकी परिशङ्का करती हैं, आपके लिए मृदु शय्याकी रचना करती हैं, आपके आनेमें विलम्ब होनेपर अधिक दुःखी होती हैं। इस प्रकार अलंकरण, विकल्प, तल्परचना, प्रेमालाप, संकल्प आदि अनेक प्रकारकी लीलाओंमें आसक्त रहकर भी आपके विरहमें वह रात्रि नहीं बिता पा रही हैं। पद्यानुवाद— पत्तोंकी आहटसे आनेकी जब शङ्का होती सजा अंक मृदु शैया सत्वर उत्सुक है अति होती। कल्प, तल्प, संकल्प भावमें यद्यपि उलझी रहती तुम बिन नहीं काट पाती निशि, घड़ियाँ गिनती रहती॥ बालबोधिनी—वासकसज्जाकी मनःस्थितियोंका, आकुल क्रिया और चेष्टाओंका वर्णन करती हुई सखी श्रीकृष्णसे कहती है—श्रीराधा ध्यान आदिके द्वारा तुम्हारे साथ रमण करती हुई भी आपसे साक्षात् संयोग प्राप्त नहीं होनेके कारण अति विकल हैं। हे माधव ! मेरी वरसुन्दरी सखी आपके आगमनकी प्रत्याशामें आपको आकर्षित करनेवाले आभूषणोंसे अपने श्रीअङ्गोंको विभूषित करती हैं। तरु-पल्लव जब समीरसे आन्दोलित होकर खड़खड़ाता है, तो उसे इस बातकी शङ्का होती है कि आप आ रहे हैं। पुनः आप अवश्य आयेंगे—ऐसा सोचकरके किसलयोंसे सेजकी रचना करती है। आपमें खोयी हुई आपकी ही बाट जोहती हुई आपका ही ध्यान करती हैं। आपको वहाँ प्रस्तुत न देखकर अत्यन्त दुःखित हो जाती हैं। इस प्रकार अलङ्कार-धारण, आपके आगमनकी शङ्का, आपके निश्चित आगमनके संकल्पसे शय्या-रचना आदि अनेक प्रकारकी क्रियाओंमें तल्लीन रहकर भी आपके बिना रात्रिका अतिवाहन करनेमें नितान्त असमर्थ हैं।
षष्ठः सर्गः-धृष्ट-वैकुण्ठः २२१ प्रस्तुत श्लोकमें शार्दूलविक्रीड़ित छन्द और समुच्चय अलङ्कार है। किं विश्राम्यसि कृष्ण-भोगि-भवने भाण्डीर-भूमीरुहे। भ्रातर्याहि न दृष्टि-गोचरभितः सानन्द-नन्दास्पदम् ॥ राधाया वचनं तदध्वग-मुखानन्दान्तिके गोपतो। गोविन्दस्य जयति सायमतिथि-प्राशस्त्य-गर्भा गिरः ? इति श्रीगीतगोविन्दे द्वादशः सन्दर्भः। इति श्रीगीतगोविन्दे महाकाव्ये वासकसज्जावर्णने धृष्ट-वैकुण्ठो नाम षष्ठः सर्गः॥ अन्वय—[इदानीं कविः एतद्वर्णन-व्याकुलः तस्य अभिसारात् पूर्वचरितं कथयन् सर्गान्ते आशिषं प्रयुङ्क्ते]—हे भ्रातः (पथिक !) कृष्णभोगि भवने (कृष्णसर्पस्य आश्रयस्थाने; पक्षे सम्भोगविशिष्टस्य श्रीकृष्णस्य भवने विहरणस्थाने) भाण्डीर-भूमीरुहे (भाण्डीर-वृक्षे लक्षणया तदीय तले इत्यर्थः) किं (कथं) विश्राम्यसि (विश्रामं माकुरु इत्यर्थः) [तर्हि इदानीं क्व यामि इत्यत आह]—इतः (अस्मात् स्थानात्) दृष्टिगोचरं (इतो दृश्यते इति भावः) सानन्द-नन्दास्पदं (आनन्देन सह वर्त्तमानं नन्दस्य आस्पदं गृहं; पक्षे उत्सवपूर्णमानन्दनिकेतनं) किं (कथं) न यासि [येन तव शङ्का न भवेदिति भावः]। राधायाः तत् (एतत्) वचनम् (सङ्केतवाक्यम्) अध्वग-मुखात् (पथिकवदनात्, पथिक-वेशिन्या दूत्या मुखादिति भावः) नन्दान्तिके (नन्दसमीपे) गोपतः (गोपयतः) गोविन्दस्य सायं (सन्ध्यासमये) अतिथि-प्राशस्त्य-गर्भा (अतिथेस्तस्यैव प्राशस्त्यं प्रशंसादिरूपं तदेव गर्भोऽभिप्रायो यासां ताः) गिरः (वाचः) जयन्ति (श्रीराधाया मनोरथं पूरयन्ति) [अतएव धृष्टः प्रगल्भो वैकुण्ठो यत्र इत्यायं सर्गः षष्ठः] ॥३॥ अनुवाद—श्रीराधाने सखीका विलम्ब देखकर श्रीकृष्णके समीप बहाना बनाकर एक दूतीको भेजा। उस दूतीने
२२२ श्रीगीतगोविन्दम् सायंकाल पथिक वेशमें श्रीकृष्णके समीप आकर श्रीराधाके द्वारा दिये हुए इन संकेत वाक्योंको कहा—“श्रीराधाके घरमें अतिथि बनने पर उन्होंने मुझसे कहा कि हे भ्रात ! इस भाण्डीर वृक्षके तले विश्राम क्यों कर रहे हो? यहाँ तो श्रीकृष्ण (काल) सर्प रहता है। सामने ही दृष्टिगोचर होनेवाले आनन्दप्रद नन्दालयमें चले जाओ। तुम वहाँ क्यों नहीं जा रहे हो?” कहीं उनके पिता श्रीनन्द महाराज इन बातोंका भावार्थ समझ न लें, इसलिए श्रीकृष्ण उनसे गोपन करनेके लिए श्रीराधाजीके द्वारा प्रेरित दूतको जो धन्यवाद दिया है, वे वाणियाँ जययुक्त हों। बालबोधिनी—महाकवि जयदेव इस श्लोकके द्वारा आशीर्वाद देते हुए इस सर्गका उपसंहार करते हैं। सायंकालके अतिथिकी प्रशंसासे युक्त श्रीगोविन्दकी वाणियोंकी जय हो। जय-जयकारसे श्रीकृष्णकी सर्वोत्कृष्टता सिद्ध होती है। जैसे श्रीकृष्णने पथिकके मुँहसे निःसृत श्रीराधा-विषयक बातको छिपानेके लिए पथिकसे कहा—हे भाई! यहाँ काले सर्पके घरमें वटवृक्षके नीचे क्यों विलाप कर रहे हो? यहाँसे सामने ही दृष्टिगोचर होनेवाले आनन्दप्रद नन्दके घरमें चले जाओ, जो थोड़ी ही दूरपर स्थित है। जब सखीको लौटनेमें विलम्ब होता हुआ देखा तो श्रीराधाने एक दूतीको कोई बहाना बनाकर श्रीकृष्णके समीप भेजा। उस दूतीने सन्ध्याके समय पथिक वेशमें श्रीकृष्णके समीप जाकर श्रीराधाके द्वारा दिये हुए जो संकेत वाक्य कहे थे, उसको गोपन करनेके लिए श्रीकृष्णने जो प्रशंसायुक्त वाणी कही, उसकी जय हो। इति श्रीगीतगोविन्दमें धृष्ट-वैकुण्ठनामक षष्ठसर्गकी बालबोधिनी वृत्ति।
सप्तमः सर्गः नागर-नारायणः अत्रान्तरे च कुलटा-कुल-वर्त्म-पात सञ्जात-पातक इव स्फुट-लाञ्छन-श्रीः। वृन्दावनान्तरमदीपयदंशु-जालै- र्दिक्सुन्दरी-वदन-चन्दन-बिन्दुरिन्दुः ॥१॥ अन्वय-अत्रान्तरे (अस्मिन् अवसरे) दिक्सुन्दरी- वदन-चन्दन-विन्दुः (दिक् पूर्वा सैव सुन्दरी तस्याः वदने चन्दन विन्दुरिव इति लुप्तोपमा) कुलटा-कुल-वर्त्मपात- सञ्जात-पातकः इव (कुलटानां कुलवर्त्मनः कुलाचारात् यः पातः पातनः तस्मात् सञ्जातं पातकं तज्जात-रोगविशेषो यस्य तथा-भूत इव) स्फुटलाञ्छनश्रीः (स्फुटा) सुव्यक्ता लाञ्छनस्य कलङ्कस्य श्रीः शोभा यस्मिन् तादृशः; यः खलु पातकी भवति स रोगविशेषचिह्नितो भवतीति भावः; अनेन चन्द्रस्य पूर्णप्रायता उक्ता] इन्दुः (चन्द्रः) अंशुजालैः (किरण समूहैः) वृन्दावनान्तरम् अदीपयत् ॥१॥ अनुवाद-श्रीकृष्ण श्रीराधाके समीप जानेके लिए सोच ही रहे थे कि इतनेमें पूर्व दिशारूपी सुन्दर वधूके वदन कमलमें चन्दन-बिन्दुके समान कुछ ही दूरी पर जैसे कुलटा स्त्री कुलधर्मका त्याग करने पर जिस विशेषरोगको (क्षयरोग) भोग करती है, उसके चिह्नकी भाँति अपने अङ्गमें कलंकको धारण करते हुए सुस्निग्ध किरणोंके द्वारा श्रीवृन्दावन धामको अतिशय सुशोभित कर दिया। पद्यानुवाद- इसी समय 'कुलटा कुल' का 'संकेत-गमन' अवरोधे। प्रकटित कर लाञ्छन-श्री अपनी पातकको परिशोधे॥ वृन्दावनके कुंज मध्य अब इन्दु अंशसह हासे। दिशा-सुन्दरीके मुख पर ज्यों चन्दन-बिन्दु विलासे॥
२२४ श्रीगीतगोविन्दम् बालबोधिनी—मानिनियोंके मानका खण्डन करनेवाले पूर्ण चन्द्रोदय-मण्डलका वर्णन करते हुए कवि कहते हैं—जिस समय श्रीराधा श्रीकृष्णके विरहमें सन्तप्त हो रही थीं, उसी समय पूर्ण चन्द्रमाने वृन्दावनको अपनी किरणोंसे प्रकाशित कर दिया। कुलटा-कामिनियोंके मार्गमें बाधा उत्पन्न करनेके कारण जिस चन्द्रमाको पाप लग गया है, वह पाप उसकी मृगलाञ्छनश्रीसे स्पष्ट प्रतीत हो रहा है। अथवा पूर्व दिशा रूपी सुन्दरीके मुखमण्डलको अलंकृत करनेवाले चन्दनबिन्दुकी भाँति अपने कलङ्कको धारणकर उस द्विजराजने समस्त दिशाओंको अपने प्रकाशसे अलंकृत कर दिया। अथवा जिस प्रकार चन्दनका बिन्दु सुन्दरीके ललाटको समलंकृत करता है, उसी प्रकार दिशारूपी सुन्दरीको चन्द्रमाने समलंकृत किया। पातक इव—दूसरेके मार्गमें जो बाधा उत्पन्न करता है, उसे पापी माना जाता है। कुलटाएँ अपने प्रेमियोंसे मिलनेके लिए रातमें ही निकलती हैं। अतः चन्द्रमाके उदित होनेसे अन्धकार प्रकाशित होने लगता है, जिससे कामिनियोंके मार्गमें बाधा उत्पन्न होती है। इसीका पाप चन्द्रमामें मृगलाञ्छनके रूपमें प्रतीत हो रहा है। चन्द्रमा एक ओर तो सकलङ्क है, दूसरी ओर उन्मुक्त दिशाओंका शृङ्गार। प्रस्तुत श्लोकमें वसन्ततिलका छन्द है, रूपक तथा उत्प्रेक्षा अलङ्कार है। प्रसरति शशधर-बिम्बे विहित-विलम्बे च माधवे विधुरा। विरचित-विविध-विलापं सा परितापं चकारोच्चैः ॥२॥ अन्वय—शशधर-बिम्बे (चन्द्रमण्डले) प्रसरति (उद्गच्छति) माधवे (कृष्णे) कृतविलम्बे (आगमने विलम्बं कृतवतिच) [सति] विधुरा (विरहाकुला) राधा उच्चैः विरचित-विविध-विलापं
सप्तमः सर्गः—नागर-नारायणः २२५ (विरचितः कृतः विविधः विलापः विविधशङ्कारूपः यस्मिन् तद् यथा तथा) परितापं चकार ॥२॥ अनुवाद—शशधर मण्डल पूर्ण रूपसे उदित हो गया है, माधव आनेमें विलम्ब कर रहे हैं, इसीलिए श्रीराधा विरहमें सन्तप्त होकर विविध प्रकारका उच्च-स्वरसे विलाप करती हुई बहुत अधिक परितापित होने लगीं। पद्यानुवाद— चढ़ता चन्द्र गगनमें लखकर हरि आगममें बाधा। बिलख बिलख परितापमयी अति रो उठती है राधा ॥ बालबोधिनी—चन्द्रमाके उदित होते ही माधवके आनेकी आशा क्षीण होने लगी, अतएव श्रीराधा उनके विरहसे बड़ी सन्तप्त हो गयीं। उसी सन्तापका वर्णन करते हुई सखी कहती है—अतिशय विधुर भावसे श्रीराधा बड़ी सन्तप्त होकर उच्च-स्वरसे विलाप करने लगीं। चन्द्रमाका बिम्ब विस्तीर्ण हो रहा था और माधव श्रीराधासे मिलनेको आनेके लिए विलम्ब कर रहे थे, व्याकुल श्रीराधा फूट-फूटकर बिलखने लगीं। प्रस्तुत श्लोकमें आर्या छन्द है। त्रयोदशः सन्दर्भः गीतम् ॥१३॥ मालवराग-यतितालाभ्यां गीयते। अनुवाद—यह तेरहवाँ प्रबन्ध मालव राग तथा यति तालमें गाया जाता है। कथित-समयेऽपि हरिरहह न ययौ वनं। मम विफलमिदममलमपि रूपयौवनं ॥ यामि हे! कमिह शरणं सखीजन-वचन-वञ्चिता ॥१॥ध्रुवम्! अन्वय—अहह (खेदे) कथित-समये (निर्द्धारित-समये, चन्द्रानुदय-काले इत्यर्थः) हरिः (मन्मनोहरः) [मन्मनो हृत्वा
“विफल रूप यौवन नव मेरा जो न उन्हें यह भाये।”
सप्तमः सर्गः-नागर-नारायणः २२७ इत्यर्थः] वनमपि न ययौ [कुतोऽत्रागमनमित्यर्थः] इदं मम रूपयौवनं विमलमपि (अनवद्यमपि) [तेन बिना] विफलम् (व्यर्थम्); [अतएव] हे [नाथ] सखीगण-वचन-वञ्चिता (कृष्ण इह अचिरेणैव स्वयमायास्यतीति सखीजनस्य आश्वासनवचनेन वञ्चिता विप्रलब्धा) अहम् इह (अधुना) कं शरणं यामि ॥१॥ अनुवाद—मेरा अमल रूप-यौवन व्यर्थ ही है, क्योंकि संकेत-कालमें हरि वनमें नहीं आये। सखियोंसे वञ्चित अब मैं किसकी शरणमें जाऊँ? पद्यानुवाद— बीत रहा संकेत-समय पर वे न कुंजमें आये विफल रूप यौवन नव मेरा जो न उन्हें यह भाये। मैं भोली ठग गयी सखीके आश्वासन वचनों में अब किसकी शरणोंमें जाऊँ भूली-सी सपनों में॥ बालबोधिनी—विरह-वेदनाकी अतिशय तीव्रताका अनुभव करती हुई श्रीराधाको अत्यन्त सन्ताप हो रहा है—सखी! तुमने तो कहा था मैं उन्हें अभी लेकर आती हूँ, तुम यहीं रहो, पर तुमने भी मेरी प्रताड़ना कर दी। चन्द्रोदयसे पहले यहाँ संकेत कुंजमें आनेकी बात थी, अब तो चन्द्रमा गगनमें अधिकाधिक उठता जा रहा है, तुम्हारे झूठे आश्वासनोंने मुझे ठग लिया है। मेरा यह निर्मल-अनवेद्य रूप-यौवन व्यर्थ ही प्रतीत होता है। यदि ये सार्थक होते तो वे अवश्य यहाँ उपस्थित होते। 'अहह' पदसे श्रीराधाका गहन कष्ट सूचित होता है। हे शब्दका प्रयोग सम्बोधनपरक है। यदनुगमनाय निशि गहनमपि शीलितं। तेन मम हृदयमिदमसमशर-कीलितम्— यामि हे! कमिह... ॥२॥ अन्वय—यदनुगमनाय (यस्य कृष्णस्य अनुगमनाय निरन्तरं सङ्गमाय) निशि (रात्रौ) [गृहवासं विहाय] गहनमपि (निविड़मपि)
२२८ श्रीगीतगोविन्दम् वनं शीलितं (सेवितम्), तेन (कृष्णेन हेतुना) इदं मम हृदयम् असमशर-कीलितं (असम-शरेण पञ्चबाणेन कामेन कीलितं नितरां विद्धमित्यर्थः) [हे नाथ सखीजन-वञ्चिता इह कं शरणं यामीति सर्वत्र योजनीयम्] ॥२॥ अनुवाद—हाय! जिनका अनुसरण करनेके लिए मैं इतनी गहन निशामें इस बीहड़ वनमें भी आ गयी और वही मेरे हृदयको कामबाणोंसे बेध कर रहा है। हाय! मैं किसकी शरणमें जाऊँ? पद्यानुवाद— जिसकी मिलन-चाह ले इतनी गहन निशामें आयी। वही हृदयको मदन-शरोंसे छेद रहा री मायी ॥ बालबोधिनी—श्रीराधा कहती हैं कि जिनके साथ मिलनके लिए मैं एकान्त निर्जन काननमें आयी, उसीने मेरे हृदयमें कामकी कील ठोक दी है या कामका कोई बीजमन्त्र ऐसा कीलित कर दिया है कि मैं कहींकी नहीं रही। 'अपि' से तात्पर्य है ऐसा मैंने पहले कभी नहीं किया था। मम मरणमेव वरमिति-वितथ-केतना। किमिति विषहामि विरहानलमचेतना— यामि हे! कमिह... ॥३॥ अन्वय—अति-वितथ-केतना (अतिवितथं नितान्तव्यर्थं केतनं देहः यस्याः तादृशी) [कृष्णविरहेण] अचेतना च [अहम्] इह (अधुना) किं (कथं) विरहानलं विषहामि [अतः] मरणमेव वरं (श्रेष्ठम्) ॥३॥ अनुवाद—यह शरीर धारण करना व्यर्थ है, मुझे मर जाना चाहिए। मैं अचेत हो रही हूँ, अब यह दुःसह विरहानल कैसे सहन करूँ? पद्यानुवाद— विरह-अनलमें जलूँ कहाँ तक? हुआ विधाता वाम। मरना ही अच्छा है अब तो, व्यर्थ हुई बदनाम ॥
सप्तमः सर्गः—नागर-नारायणः २२९ बालबोधिनी—मैं भ्रष्ट हो रही हूँ, जिनके साथ संगमके लिए मैं घोर अन्धकारपूर्ण रात्रि-कालमें गम्भीर वनमें बैठी रही, विह्वल और अचेतन हो गयी, मैं उनके विरहसे कितनी अधीर हो रही हूँ, मैं कहाँ जाऊँ, मेरा तो मरना ही अच्छा है, कितना विरह ताप सहन करूँ मैं, आशाके सभी संकेत झूठे हो गये हैं। मेरा यह शरीर व्यर्थ ही है, नहीं तो हरि ऐसी उपेक्षा नहीं करते, सखीकी बातोंमें आकर मैंने यहाँ आनेका साहस कर लिया, पर मेरे सारे प्रयास व्यर्थ हैं, जीना व्यर्थ है। मामहह विधुरयति मधुर-मधु-यामिनी। कापि हरिमनुभवति कृत-सुकृत-कामिनी— यामि हे! कमिह... ॥४॥ अन्वय—अहह (खेदे मधुर-मधुयामिनी) (मधुरा मनोहारिणी मधुयामिनी वासन्ती रात्रिः) मां विधुरयति (व्याकुली करोति; या वासन्ती निशा दूरस्थमपि प्रियं सङ्गमयति, सैव सुकृताभावात् मां विधुरयतीति भावः)। कापि कृतसुकृत-कामिनी (कृतं सुकृतं यया तादृशी कामिनी भाग्यवती रमणी) हरिम् अनुभवति (तेन सह रहःकेलिसुखमनुभवतीत्यर्थः) ॥४॥ अनुवाद—ओह ! यह कैसा दुर्भाग्य है मेरा। यह सुमधुर वसन्तकी रात्रि मुझको विरह-वेदनासे अधीर कर रही है और उधर ऐसे समयमें निश्चित ही कोई कामिनी अपने पुण्यके फलस्वरूप परम सुखसे श्रीकृष्णके साथ रतिसुखका अनुभव कर रही है। पद्यानुवाद— इधर मधुर यह रात मुझे अब रह रह रुला रही है। उधर अन्य कृत सुकृत कामिनी हरिको भुला रही है॥ बालबोधिनी—अन्तर-हृदयकी विकट विरह-वेदनाको अभिव्यक्त करती हुई श्रीराधा कहती हैं—परमसुखस्वरूपा वसन्त ऋतुकी ये सरस रात्रियाँ मुझे अतिशय व्यथित कर
२३० श्रीगीतगोविन्दम् रही हैं, दूसरी ओर कोई सुकृतशालिनी किशोरी श्रीकृष्णके साथ रति-क्रीड़ाका रसास्वादन कर रही है। उस विलासिनीके प्रेमपाशमें बँधकर रमण करते हुए श्रीकृष्ण इस संकेत-भूमि पर नहीं आये। कितनी सुकृतिका अभाव है? मैं विरह-विधुरा होकर विलाप कर रही हूँ और दूसरी उनके साथ रति-सुखका अनुभव कर रही है। विश्वकोषमें विधुरका तात्पर्य 'विकलता' से है। अहह कलयामि वलयादि-मणि-भूषणम्। हरि-विरह-दहन-वहनेन बहु-दूषणम्— यामि हे! कमिह... ॥५॥ अन्वय—अहह, हरि-विरह-दहन-बहनेन (हरिविरह एव दहनो वह्निः तस्य वहनेन धारणेन) वलयादि-मणि-भूषणं (मत्परिहित-कङ्कणादि-रत्नालङ्कारः) बहुदूषणं (बहूनि दूषणानि यस्य तत् अत्यधिक-दोषावहं, विरहानलसन्धुक्षितत्वात् अतिकलेशकरमित्यर्थः) कलयामि (मन्ये) [प्रियावलोकफलोहि स्त्रीणां वेश इत्युक्तेः] ॥५॥ अनुवाद—हाय! मणिजड़ित बलयादि आभूषण समुदाय मेरे विरहानलको उद्दीपित कराकर मुझे अशेष दुःख प्रदान कर रहा है। अतः यह तो दोषयुक्त ही प्रतीत हो रहा है। पद्यानुवाद— मणि-भूषण दूषण लगते हैं, पिय बिन कुछ न सुहाता। बालबोधिनी—आह! सखि! तुमने बड़ा छल किया। मैंने पुष्पों-पल्लवों, मणियोंसे सजे इतने आभूषणोंसे शरीरको सजाया, पर सभी हरिके विरहकी आगमें अनल सदृश ही प्रतीत हो रहे हैं। मदनकी वेदनासे शरीर विरहाग्निमें तप्त हो रहा है। अब ये आभूषण नहीं रहे, अभिशाप हो गये हैं, क्योंकि प्रियके अवलोकनका फल ही रमणियोंका सौन्दर्य
सप्तमः सर्गः—नागर-नारायणः २३१ एवं परिधान है अथवा अलङ्कारका प्रियत्व तो तभी अनुभव होता है, जब कोई उनको प्रेमपूर्वक देखनेवाला हो। अतः इनसे प्रियत्वकी प्रतीति नहीं, दोषकी प्रतीति होती है। कुसुम-सुकुमार-तनुमतनु-शर लीलया। स्रगपि हृदि हन्ति मामतिविषम-शीलया— यामि हे ! कमिह... ॥६॥ अन्वय—[का कथान्यभूषणानाम्]—[तत्प्रीतये] हृदि (हृदये) [निहिता] स्रक् अपि (कुसुममाल्यमपि; अतिसुकोमल- सुखस्पर्शमपीति भावः) अतिविषमशीलया (अतिविषमम् अतिदारुणं शीलं स्वभावो यस्यास्तादृश्या; अन्यस्तु बाणः क्षतुमुत्पाद्य व्यथयति, कामबाणस्तु विध्यन् अन्तर्भिनत्तीति विषमशीलत्वमस्य) अतनु-शरलीलया (कामबाण-विलासेन) कुसुम-सुकुमार-तनुं (कुसुमतः अपि सुकुमारी तनुः यस्याः तादृशीं; तत्सहन-सामर्थ्यमपि नास्त्यस्या इत्यर्थः) मां हन्ति (निपीडयति) ॥६॥ अनुवाद—(दूसरे आभूषणोंकी तो बात ही क्या) मेरे वक्षःस्थलपर स्थित यह वनमाला अतिशय कोमल कुसुमसे भी सुकुमार मेरे शरीरको भी काम-शरकी भाँति विषम रूपसे आघात प्रदान कर रही है। पद्यानुवाद— कुसुम देह पर कुसुम हार था, वहन नहीं हो पाता। बालबोधिनी—हे कान्त ! दूसरे आभूषणोंकी बात क्या कहूँ, उनकी प्रसन्नताके लिए जो वनमाला हृदयपर धारण करती हूँ, वही कामदेवका अस्त्र बनकर मेरे प्राण ले लेती है, काम-बाणकी भाँति हृदयको बेधने लगती है तथा उसका प्रहार इतना विषममय और असह्य होता है कि कुसुमसे भी अतिशय सुकुमार देह उसकी विषमताको सहन नहीं कर पाती है। बाणोंसे शरीर क्षत-विक्षत होता है तो मानो
२३२ श्रीगीतगोविन्दम् सामान्य-सी पीड़ा होती है, किन्तु इन कामबाणोंके द्वारा बिंधे हृदयकी व्यथा सह्य नहीं होती। अहमिह निवासामि न गणित-वनवेतसा। स्मरति मधुसूदनो यामपि न चेतसा— यामि हे! कमिह... ॥७॥ अन्वय—मधुसूदनः चेतसा (मनसा) अपि मां न स्मरति [अहो अस्थिर-सौहृदं मधुसूदनस्य]। अहं [पुनः] [भीतिमगणय्य] न गणितवन-वेतसा (न गणितं वनवेतसम् अतीवक्लेशकरमिति भावः, यया तादृशी) इह (भयङ्करे वने) [तत्समागमाकाङ्क्षया] निवसामि [अहो मे मूढ़ता] ॥७॥ अनुवाद—मैं यहाँ भयानक वेतस वनमें भी निर्भय होकर श्रीकृष्णके लिए बैठी हूँ, किन्तु कितने आश्चर्यकी बात है कि वे मधुसूदन मुझे एक बार भी स्मरण नहीं करते। पद्यानुवाद— जिनके लिए त्याग महलोंको बैठी वेतस वनमें। क्या आ पायी सुधि भी मेरी क्षण भर उनके मनमें॥ बालबोधिनी—श्रीराधा दैन्य प्रकाश करती हुई कहती है कि श्रीमन्मधुसूदनसे मिलनेके लिए सखीकी बात मानकर मैं इस भयङ्कर वनके भीतर निर्भय होकर बैठी हूँ, परन्तु मधुसूदनको मेरी कोई चिन्ता नहीं है, उनका सुहृदय बड़ा अस्थिर है, बड़े आश्चर्यकी बात है कि इस बीहड़ वनमें जिनके लिए मैं प्रतीक्षा कर रही हूँ, वे मेरा एक बार भी स्मरण नहीं करते। हाय! हाय! यह मेरा ही दुर्भाग्य है। हरि-चरण-शरण-जयदेव-कवि-भारती। वसतु हृदि युवतिरिव कोमल-कलावती— यामि हे! कमिह... ॥८॥
सप्तमः सर्गः—नागर-नारायणः २३३ अन्वय—कोमल-कलावती (कोमला माधुर्यगुणसम्पन्ना कलावती कवित्व-कला-शालिनी च) हरि-चरण-शरण-जयदेव- कवि-भारती (हरिचरण-मेव शरणम् आश्रयो यस्याः तथाभूता जयदेवकवेः भारती वाणी) [यूनां हृदये कोमलकलावती कोमला मृद्वङ्गी कलावती रति-कलानिपुणा] युवतिरिव [रसज्ञानां भक्तानां] हृदि (हृदये) वसतु] ॥८॥ अनुवाद—कोमल वपुवाली मनोहर लावण्यवती कला- समलंकृत युवती जैसे सुन्दर गुणोंवाले युवकोंके मनमें सदा विराजमान रहती है, वैसे ही श्रीकृष्णके चरणोंके शरणागत श्रीजयदेव कविद्वारा विरचित यह सुललित गीति भक्तजनोंके मनमें सदा विराजमान हो। पद्यानुवाद— मंजुल वंजुल लता-कुंजमें मुझे बुलाये एकाकी। कहाँ विलसने लगे छली वे, झलकी किसकी झाँकी ॥ बालबोधिनी—जयदेव कवि कहते हैं कि उनके रक्षक एकमात्र श्रीकृष्णके चरण ही हैं। उनसे अलग उनका और कोई रक्षक नहीं है। जयदेव रचित कविता कोमल वर्णमयी और काव्य-सौष्ठवकी कलाओंसे समलंकृत है—यह कविता भक्तोंके हृदयमें उसी प्रकार स्थान प्राप्त करे, जिस प्रकार कोमल वपुवाली तथा शृङ्गार आदि रसवर्द्धिनी छह कलाओंसे विशिष्ट कोई सुन्दरी अपने नायकके हृदयमें विराजती है। यथा लावण्य विभूषिता कोई नायिका अपने नायकके मनको अत्यधिक आनन्द प्रदान किया करती है, उसी प्रकार यह काव्य भक्तोंके हृदयको भी आनन्दित करे—यह कविकी कामना है। तत्किं कामपि कामिनीमभिसृतः किं वा कलाकेलिभि- र्बद्धो बन्धुभिरन्धकारिणि वनाभ्यर्णे किमुद्भ्राम्यति। कान्त! क्लान्तमना मनागपि पथि प्रस्थातुमेवाक्षमः संकेतीकृत-मञ्जु-वञ्जुल-लता-कुञ्जेऽपि यन्नागतः ॥१॥