गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)
Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary
महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसप्तमः सर्गः—नागर-नारायणः २२५ (विरचितः कृतः विविधः विलापः विविधशङ्कारूपः यस्मिन् तद् यथा तथा) परितापं चकार ॥२॥ अनुवाद—शशधर मण्डल पूर्ण रूपसे उदित हो गया है, माधव आनेमें विलम्ब कर रहे हैं, इसीलिए श्रीराधा विरहमें सन्तप्त होकर विविध प्रकारका उच्च-स्वरसे विलाप करती हुई बहुत अधिक परितापित होने लगीं। पद्यानुवाद— चढ़ता चन्द्र गगनमें लखकर हरि आगममें बाधा। बिलख बिलख परितापमयी अति रो उठती है राधा ॥ बालबोधिनी—चन्द्रमाके उदित होते ही माधवके आनेकी आशा क्षीण होने लगी, अतएव श्रीराधा उनके विरहसे बड़ी सन्तप्त हो गयीं। उसी सन्तापका वर्णन करते हुई सखी कहती है—अतिशय विधुर भावसे श्रीराधा बड़ी सन्तप्त होकर उच्च-स्वरसे विलाप करने लगीं। चन्द्रमाका बिम्ब विस्तीर्ण हो रहा था और माधव श्रीराधासे मिलनेको आनेके लिए विलम्ब कर रहे थे, व्याकुल श्रीराधा फूट-फूटकर बिलखने लगीं। प्रस्तुत श्लोकमें आर्या छन्द है। त्रयोदशः सन्दर्भः गीतम् ॥१३॥ मालवराग-यतितालाभ्यां गीयते। अनुवाद—यह तेरहवाँ प्रबन्ध मालव राग तथा यति तालमें गाया जाता है। कथित-समयेऽपि हरिरहह न ययौ वनं। मम विफलमिदममलमपि रूपयौवनं ॥ यामि हे! कमिह शरणं सखीजन-वचन-वञ्चिता ॥१॥ध्रुवम्! अन्वय—अहह (खेदे) कथित-समये (निर्द्धारित-समये, चन्द्रानुदय-काले इत्यर्थः) हरिः (मन्मनोहरः) [मन्मनो हृत्वा