गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)
Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary
महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२२४ श्रीगीतगोविन्दम् बालबोधिनी—मानिनियोंके मानका खण्डन करनेवाले पूर्ण चन्द्रोदय-मण्डलका वर्णन करते हुए कवि कहते हैं—जिस समय श्रीराधा श्रीकृष्णके विरहमें सन्तप्त हो रही थीं, उसी समय पूर्ण चन्द्रमाने वृन्दावनको अपनी किरणोंसे प्रकाशित कर दिया। कुलटा-कामिनियोंके मार्गमें बाधा उत्पन्न करनेके कारण जिस चन्द्रमाको पाप लग गया है, वह पाप उसकी मृगलाञ्छनश्रीसे स्पष्ट प्रतीत हो रहा है। अथवा पूर्व दिशा रूपी सुन्दरीके मुखमण्डलको अलंकृत करनेवाले चन्दनबिन्दुकी भाँति अपने कलङ्कको धारणकर उस द्विजराजने समस्त दिशाओंको अपने प्रकाशसे अलंकृत कर दिया। अथवा जिस प्रकार चन्दनका बिन्दु सुन्दरीके ललाटको समलंकृत करता है, उसी प्रकार दिशारूपी सुन्दरीको चन्द्रमाने समलंकृत किया। पातक इव—दूसरेके मार्गमें जो बाधा उत्पन्न करता है, उसे पापी माना जाता है। कुलटाएँ अपने प्रेमियोंसे मिलनेके लिए रातमें ही निकलती हैं। अतः चन्द्रमाके उदित होनेसे अन्धकार प्रकाशित होने लगता है, जिससे कामिनियोंके मार्गमें बाधा उत्पन्न होती है। इसीका पाप चन्द्रमामें मृगलाञ्छनके रूपमें प्रतीत हो रहा है। चन्द्रमा एक ओर तो सकलङ्क है, दूसरी ओर उन्मुक्त दिशाओंका शृङ्गार। प्रस्तुत श्लोकमें वसन्ततिलका छन्द है, रूपक तथा उत्प्रेक्षा अलङ्कार है। प्रसरति शशधर-बिम्बे विहित-विलम्बे च माधवे विधुरा। विरचित-विविध-विलापं सा परितापं चकारोच्चैः ॥२॥ अन्वय—शशधर-बिम्बे (चन्द्रमण्डले) प्रसरति (उद्गच्छति) माधवे (कृष्णे) कृतविलम्बे (आगमने विलम्बं कृतवतिच) [सति] विधुरा (विरहाकुला) राधा उच्चैः विरचित-विविध-विलापं