गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)
Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary
महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२२८ श्रीगीतगोविन्दम् वनं शीलितं (सेवितम्), तेन (कृष्णेन हेतुना) इदं मम हृदयम् असमशर-कीलितं (असम-शरेण पञ्चबाणेन कामेन कीलितं नितरां विद्धमित्यर्थः) [हे नाथ सखीजन-वञ्चिता इह कं शरणं यामीति सर्वत्र योजनीयम्] ॥२॥ अनुवाद—हाय! जिनका अनुसरण करनेके लिए मैं इतनी गहन निशामें इस बीहड़ वनमें भी आ गयी और वही मेरे हृदयको कामबाणोंसे बेध कर रहा है। हाय! मैं किसकी शरणमें जाऊँ? पद्यानुवाद— जिसकी मिलन-चाह ले इतनी गहन निशामें आयी। वही हृदयको मदन-शरोंसे छेद रहा री मायी ॥ बालबोधिनी—श्रीराधा कहती हैं कि जिनके साथ मिलनके लिए मैं एकान्त निर्जन काननमें आयी, उसीने मेरे हृदयमें कामकी कील ठोक दी है या कामका कोई बीजमन्त्र ऐसा कीलित कर दिया है कि मैं कहींकी नहीं रही। 'अपि' से तात्पर्य है ऐसा मैंने पहले कभी नहीं किया था। मम मरणमेव वरमिति-वितथ-केतना। किमिति विषहामि विरहानलमचेतना— यामि हे! कमिह... ॥३॥ अन्वय—अति-वितथ-केतना (अतिवितथं नितान्तव्यर्थं केतनं देहः यस्याः तादृशी) [कृष्णविरहेण] अचेतना च [अहम्] इह (अधुना) किं (कथं) विरहानलं विषहामि [अतः] मरणमेव वरं (श्रेष्ठम्) ॥३॥ अनुवाद—यह शरीर धारण करना व्यर्थ है, मुझे मर जाना चाहिए। मैं अचेत हो रही हूँ, अब यह दुःसह विरहानल कैसे सहन करूँ? पद्यानुवाद— विरह-अनलमें जलूँ कहाँ तक? हुआ विधाता वाम। मरना ही अच्छा है अब तो, व्यर्थ हुई बदनाम ॥