भारतकोश
गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary

महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished448 पृष्ठ

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सप्तमः सर्गः—नागर-नारायणः २२९ बालबोधिनी—मैं भ्रष्ट हो रही हूँ, जिनके साथ संगमके लिए मैं घोर अन्धकारपूर्ण रात्रि-कालमें गम्भीर वनमें बैठी रही, विह्वल और अचेतन हो गयी, मैं उनके विरहसे कितनी अधीर हो रही हूँ, मैं कहाँ जाऊँ, मेरा तो मरना ही अच्छा है, कितना विरह ताप सहन करूँ मैं, आशाके सभी संकेत झूठे हो गये हैं। मेरा यह शरीर व्यर्थ ही है, नहीं तो हरि ऐसी उपेक्षा नहीं करते, सखीकी बातोंमें आकर मैंने यहाँ आनेका साहस कर लिया, पर मेरे सारे प्रयास व्यर्थ हैं, जीना व्यर्थ है। मामहह विधुरयति मधुर-मधु-यामिनी। कापि हरिमनुभवति कृत-सुकृत-कामिनी— यामि हे! कमिह... ॥४॥ अन्वय—अहह (खेदे मधुर-मधुयामिनी) (मधुरा मनोहारिणी मधुयामिनी वासन्ती रात्रिः) मां विधुरयति (व्याकुली करोति; या वासन्ती निशा दूरस्थमपि प्रियं सङ्गमयति, सैव सुकृताभावात् मां विधुरयतीति भावः)। कापि कृतसुकृत-कामिनी (कृतं सुकृतं यया तादृशी कामिनी भाग्यवती रमणी) हरिम् अनुभवति (तेन सह रहःकेलिसुखमनुभवतीत्यर्थः) ॥४॥ अनुवाद—ओह ! यह कैसा दुर्भाग्य है मेरा। यह सुमधुर वसन्तकी रात्रि मुझको विरह-वेदनासे अधीर कर रही है और उधर ऐसे समयमें निश्चित ही कोई कामिनी अपने पुण्यके फलस्वरूप परम सुखसे श्रीकृष्णके साथ रतिसुखका अनुभव कर रही है। पद्यानुवाद— इधर मधुर यह रात मुझे अब रह रह रुला रही है। उधर अन्य कृत सुकृत कामिनी हरिको भुला रही है॥ बालबोधिनी—अन्तर-हृदयकी विकट विरह-वेदनाको अभिव्यक्त करती हुई श्रीराधा कहती हैं—परमसुखस्वरूपा वसन्त ऋतुकी ये सरस रात्रियाँ मुझे अतिशय व्यथित कर