गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)
Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary
महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२३० श्रीगीतगोविन्दम् रही हैं, दूसरी ओर कोई सुकृतशालिनी किशोरी श्रीकृष्णके साथ रति-क्रीड़ाका रसास्वादन कर रही है। उस विलासिनीके प्रेमपाशमें बँधकर रमण करते हुए श्रीकृष्ण इस संकेत-भूमि पर नहीं आये। कितनी सुकृतिका अभाव है? मैं विरह-विधुरा होकर विलाप कर रही हूँ और दूसरी उनके साथ रति-सुखका अनुभव कर रही है। विश्वकोषमें विधुरका तात्पर्य 'विकलता' से है। अहह कलयामि वलयादि-मणि-भूषणम्। हरि-विरह-दहन-वहनेन बहु-दूषणम्— यामि हे! कमिह... ॥५॥ अन्वय—अहह, हरि-विरह-दहन-बहनेन (हरिविरह एव दहनो वह्निः तस्य वहनेन धारणेन) वलयादि-मणि-भूषणं (मत्परिहित-कङ्कणादि-रत्नालङ्कारः) बहुदूषणं (बहूनि दूषणानि यस्य तत् अत्यधिक-दोषावहं, विरहानलसन्धुक्षितत्वात् अतिकलेशकरमित्यर्थः) कलयामि (मन्ये) [प्रियावलोकफलोहि स्त्रीणां वेश इत्युक्तेः] ॥५॥ अनुवाद—हाय! मणिजड़ित बलयादि आभूषण समुदाय मेरे विरहानलको उद्दीपित कराकर मुझे अशेष दुःख प्रदान कर रहा है। अतः यह तो दोषयुक्त ही प्रतीत हो रहा है। पद्यानुवाद— मणि-भूषण दूषण लगते हैं, पिय बिन कुछ न सुहाता। बालबोधिनी—आह! सखि! तुमने बड़ा छल किया। मैंने पुष्पों-पल्लवों, मणियोंसे सजे इतने आभूषणोंसे शरीरको सजाया, पर सभी हरिके विरहकी आगमें अनल सदृश ही प्रतीत हो रहे हैं। मदनकी वेदनासे शरीर विरहाग्निमें तप्त हो रहा है। अब ये आभूषण नहीं रहे, अभिशाप हो गये हैं, क्योंकि प्रियके अवलोकनका फल ही रमणियोंका सौन्दर्य