गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)
Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary
महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसप्तमः सर्गः—नागर-नारायणः २३१ एवं परिधान है अथवा अलङ्कारका प्रियत्व तो तभी अनुभव होता है, जब कोई उनको प्रेमपूर्वक देखनेवाला हो। अतः इनसे प्रियत्वकी प्रतीति नहीं, दोषकी प्रतीति होती है। कुसुम-सुकुमार-तनुमतनु-शर लीलया। स्रगपि हृदि हन्ति मामतिविषम-शीलया— यामि हे ! कमिह... ॥६॥ अन्वय—[का कथान्यभूषणानाम्]—[तत्प्रीतये] हृदि (हृदये) [निहिता] स्रक् अपि (कुसुममाल्यमपि; अतिसुकोमल- सुखस्पर्शमपीति भावः) अतिविषमशीलया (अतिविषमम् अतिदारुणं शीलं स्वभावो यस्यास्तादृश्या; अन्यस्तु बाणः क्षतुमुत्पाद्य व्यथयति, कामबाणस्तु विध्यन् अन्तर्भिनत्तीति विषमशीलत्वमस्य) अतनु-शरलीलया (कामबाण-विलासेन) कुसुम-सुकुमार-तनुं (कुसुमतः अपि सुकुमारी तनुः यस्याः तादृशीं; तत्सहन-सामर्थ्यमपि नास्त्यस्या इत्यर्थः) मां हन्ति (निपीडयति) ॥६॥ अनुवाद—(दूसरे आभूषणोंकी तो बात ही क्या) मेरे वक्षःस्थलपर स्थित यह वनमाला अतिशय कोमल कुसुमसे भी सुकुमार मेरे शरीरको भी काम-शरकी भाँति विषम रूपसे आघात प्रदान कर रही है। पद्यानुवाद— कुसुम देह पर कुसुम हार था, वहन नहीं हो पाता। बालबोधिनी—हे कान्त ! दूसरे आभूषणोंकी बात क्या कहूँ, उनकी प्रसन्नताके लिए जो वनमाला हृदयपर धारण करती हूँ, वही कामदेवका अस्त्र बनकर मेरे प्राण ले लेती है, काम-बाणकी भाँति हृदयको बेधने लगती है तथा उसका प्रहार इतना विषममय और असह्य होता है कि कुसुमसे भी अतिशय सुकुमार देह उसकी विषमताको सहन नहीं कर पाती है। बाणोंसे शरीर क्षत-विक्षत होता है तो मानो