गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)
Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary
महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२३२ श्रीगीतगोविन्दम् सामान्य-सी पीड़ा होती है, किन्तु इन कामबाणोंके द्वारा बिंधे हृदयकी व्यथा सह्य नहीं होती। अहमिह निवासामि न गणित-वनवेतसा। स्मरति मधुसूदनो यामपि न चेतसा— यामि हे! कमिह... ॥७॥ अन्वय—मधुसूदनः चेतसा (मनसा) अपि मां न स्मरति [अहो अस्थिर-सौहृदं मधुसूदनस्य]। अहं [पुनः] [भीतिमगणय्य] न गणितवन-वेतसा (न गणितं वनवेतसम् अतीवक्लेशकरमिति भावः, यया तादृशी) इह (भयङ्करे वने) [तत्समागमाकाङ्क्षया] निवसामि [अहो मे मूढ़ता] ॥७॥ अनुवाद—मैं यहाँ भयानक वेतस वनमें भी निर्भय होकर श्रीकृष्णके लिए बैठी हूँ, किन्तु कितने आश्चर्यकी बात है कि वे मधुसूदन मुझे एक बार भी स्मरण नहीं करते। पद्यानुवाद— जिनके लिए त्याग महलोंको बैठी वेतस वनमें। क्या आ पायी सुधि भी मेरी क्षण भर उनके मनमें॥ बालबोधिनी—श्रीराधा दैन्य प्रकाश करती हुई कहती है कि श्रीमन्मधुसूदनसे मिलनेके लिए सखीकी बात मानकर मैं इस भयङ्कर वनके भीतर निर्भय होकर बैठी हूँ, परन्तु मधुसूदनको मेरी कोई चिन्ता नहीं है, उनका सुहृदय बड़ा अस्थिर है, बड़े आश्चर्यकी बात है कि इस बीहड़ वनमें जिनके लिए मैं प्रतीक्षा कर रही हूँ, वे मेरा एक बार भी स्मरण नहीं करते। हाय! हाय! यह मेरा ही दुर्भाग्य है। हरि-चरण-शरण-जयदेव-कवि-भारती। वसतु हृदि युवतिरिव कोमल-कलावती— यामि हे! कमिह... ॥८॥