गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)
Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary
महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसप्तमः सर्गः—नागर-नारायणः २३३ अन्वय—कोमल-कलावती (कोमला माधुर्यगुणसम्पन्ना कलावती कवित्व-कला-शालिनी च) हरि-चरण-शरण-जयदेव- कवि-भारती (हरिचरण-मेव शरणम् आश्रयो यस्याः तथाभूता जयदेवकवेः भारती वाणी) [यूनां हृदये कोमलकलावती कोमला मृद्वङ्गी कलावती रति-कलानिपुणा] युवतिरिव [रसज्ञानां भक्तानां] हृदि (हृदये) वसतु] ॥८॥ अनुवाद—कोमल वपुवाली मनोहर लावण्यवती कला- समलंकृत युवती जैसे सुन्दर गुणोंवाले युवकोंके मनमें सदा विराजमान रहती है, वैसे ही श्रीकृष्णके चरणोंके शरणागत श्रीजयदेव कविद्वारा विरचित यह सुललित गीति भक्तजनोंके मनमें सदा विराजमान हो। पद्यानुवाद— मंजुल वंजुल लता-कुंजमें मुझे बुलाये एकाकी। कहाँ विलसने लगे छली वे, झलकी किसकी झाँकी ॥ बालबोधिनी—जयदेव कवि कहते हैं कि उनके रक्षक एकमात्र श्रीकृष्णके चरण ही हैं। उनसे अलग उनका और कोई रक्षक नहीं है। जयदेव रचित कविता कोमल वर्णमयी और काव्य-सौष्ठवकी कलाओंसे समलंकृत है—यह कविता भक्तोंके हृदयमें उसी प्रकार स्थान प्राप्त करे, जिस प्रकार कोमल वपुवाली तथा शृङ्गार आदि रसवर्द्धिनी छह कलाओंसे विशिष्ट कोई सुन्दरी अपने नायकके हृदयमें विराजती है। यथा लावण्य विभूषिता कोई नायिका अपने नायकके मनको अत्यधिक आनन्द प्रदान किया करती है, उसी प्रकार यह काव्य भक्तोंके हृदयको भी आनन्दित करे—यह कविकी कामना है। तत्किं कामपि कामिनीमभिसृतः किं वा कलाकेलिभि- र्बद्धो बन्धुभिरन्धकारिणि वनाभ्यर्णे किमुद्भ्राम्यति। कान्त! क्लान्तमना मनागपि पथि प्रस्थातुमेवाक्षमः संकेतीकृत-मञ्जु-वञ्जुल-लता-कुञ्जेऽपि यन्नागतः ॥१॥