भारतकोश
गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary

महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished448 पृष्ठ

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२३४ श्रीगीतगोविन्दम् अन्वय—[कृष्णागमन-विलम्बे तर्कयति]—कान्तः (कृष्णः) सङ्केतीकृत-मञ्जु-वञ्जुल-लता-कुञ्जेऽपि (सङ्केतीकृतं मञ्जु मनोज्ञं यत् वञ्जुल-लतानां वेतसलतानां कुञ्जं तस्मिन्नपि) यत् (यस्मात्) न आगतः तत् (तस्मात्) किं कामपि (अभिनव-प्रेमवन्धुरां) कामिनीम् अभिसृतः (उपगतः)? [मय्येव दृढानुरागोऽसौ कथमन्यामभिसारिष्यतीति वितर्कान्तरमाह]—किंवा वन्धुभिः (मित्रैः) कलाकेलिभिः (कलानां गीतादीनां केलिभिः क्रीड़ाकौशलैः) बद्धः (आसक्तीकृतः); [कृताभिसारसमये अस्मितदपि न सम्भवतीति विचिन्त्य वितर्कान्तरमाह]—[मामभिसरन् तरूणां नीरन्ध्रतया] अन्धकारिणि वनाभ्यर्णे (वनप्रदेशे) किम् उद्भ्राम्यति [पन्थानमविदित्वेति भावः]; [चतुरशिरोमणेः सहस्रशोऽनुभूतस्थले भ्रमः कथं स्यादिति विचिन्त्य निश्चिनोति]— क्लान्तमनाः (मद्विश्लेषदुःखेन चन्द्रोदयानन्तरं तस्याः का दशा भवेदिति चिन्तया च क्लान्तम् उपतप्तं मनो यस्य तादृशः) [सन्] पथि मनागपि (अल्पमपि) प्रस्थातुम् अक्षम एव॥१॥ अनुवाद—संकेत स्थल रूपमें निर्दिष्ट मनोहर लताकुञ्जमें मेरे प्राणवल्लभ श्रीकृष्ण क्यों नहीं आये? इसका क्या रहस्य है? क्या वे किसी दूसरी कामिनीके साथ अभिसार करने चले गये? क्या अपने सखाओंके साथ क्रीड़ा-आमोदमें प्रमत्त हो निर्दिष्ट समयका उन्होंने अतिक्रमण कर दिया है? क्या सघन वृक्षोंकी छायामें घोर अन्धकारके कारण संकेत-स्थली न मिलने पर इधर-उधर भटक रहे हैं? क्या मेरे विरहमें अत्यन्त क्लान्त हो एक कदम भी चल पानेमें असमर्थ हो गये हैं? पद्यानुवाद— अथवा आये यहीं हाय पर, छाई अति अँधियारी, यहाँ-वहाँ क्या मुझे खोजते, भटक रहे वनवारी? श्रीहरि-चरण-शरण 'कवि जय'की प्रमदा सम मृदुवाणी भक्तोंके भावुक हृदयोंमें गूँज उठे कल्याणी॥

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