गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)
Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary
महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसप्तमः सर्गः-नागर-नारायणः २३५ बालबोधिनी-श्रीकृष्णके संकेत स्थल पर न आनेके कारण विरहिणी राधिका मन-ही-मन कितने प्रकारके सन्देह-संशय कर रही हैं- उनके न आनेका कारण क्या हो सकता है? मनः कल्पित सन्देहोंको प्रस्तुत करती हुई श्रीराधा कहती है, यह मनोहर वेतस-लतागृह हम दोनोंके मिलनका संकेत-स्थान था, फिर उन्हें क्या हो गया? वे क्यों नहीं आये? क्या वे दूसरी नायिकाके साथ अभिसार करने चले गये? पर मेरे प्रति उनका अनुराग कम कैसे हो सकता है? मुझे यहाँ ऐसे ही छोड़कर वे अन्यत्र विहार कैसे कर सकते हैं? क्या केलिपरायण और कलापरायण उनके बान्धवोंने उन्हें यहाँ आनेसे रोककर क्रीड़ावनमें ही रख लिया? यह भी संभव नहीं है, क्योंकि वे अभिसारके समयको किस प्रकार भूल सकते हैं? ऐसा लगता है वे चतुर चूड़ामणि अन्धकारकी अधिकताके कारण मुझको प्राप्त न कर सकनेके कारण मुझे इधर-उधर ढूँढ़ रहे हों, पर वे तो इस वनमें अभिसारके लिए कितनी ही बार आये होंगे! वे परिचित पथ कैसे भूल सकते हैं? यह भी संभव नहीं है। तो क्या वे मुझसे विच्छिन्न होनेसे क्लान्त होकर चलनेमें ही असमर्थ हो गये हैं? अथवा चन्द्रोदयके पश्चात् श्रीराधाकी दशा कैसी होगी, यह सोचकर विच्छेद दुःखसे कातर होकर यहाँ नहीं आये? प्रस्तुत पदमें शार्दूलविक्रीड़ित छन्द तथा संशय नामक अलङ्कार है। अथागतां माधवमन्तरेण सखीमियं वीक्ष्य विषादमूकाम्। विशङ्कमना रमितं कयापि जनार्दनं दृष्टवदेतदाह ॥२॥ इति त्रयोदशः सन्दर्भः। अन्वय-[चन्द्रोदयेन श्रीकृष्णागमनप्रतिवन्धे सति तं बिना सख्या आगमने तस्या विप्रलब्धावस्थां वर्णयितुमाह]- [विप्रलब्धालक्षणं यथा- 'प्रियःकृत्वापि सङ्केतं यस्या नायाति