गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)
Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary
महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२३६ श्रीगीतगोविन्दम् सन्निधिम्। प्रिलब्धेति सा ज्ञेया नितान्तमवमानिता।।” इति साहित्यदर्पणे।।] अथ (वितर्कानन्तरं) माधवम् अन्तरेण (हरिं बिना) आगतां [अतः] विषादमुकां (दुःखातिशयेन वक्तुमशक्ताम् अकृत-कार्यत्वादित्यर्थः) सखीं वीक्ष्य इयं (राधा) जनार्दनं कयापि रमितं दृष्टवत् (दृष्टमिव) विशङ्कमाना [सती] एतत् (वक्ष्यमाणं वचनम्) आह॥२॥ अनुवाद—माधवके बिना सखीको आया देख विषण्ण चित्तसे मौन धारणकर श्रीराधा आशंकित होकर सोचने लगीं—जनार्दन किसी और कामिनीके साथ रमण कर रहे हैं क्या? बालबोधिनी—चन्द्रोदय हो जानेके कारण श्रीराधा, श्रीकृष्णके संकेत-स्थल पर न आनेके कितने ही कारणोंका अनुमान कर रही थीं और सखीको श्रीकृष्णके बिना लौटती देखकर वह विप्रलब्धा स्थितिकी पराकाष्ठाको प्राप्त हो गयीं। दारुण वेदनाके कारण कुछ भी बोलनेमें असमर्थ हो गयीं। सखी भी विषण्ण अवस्थाको प्राप्त कर अवाक् थी। सखीको मौन देखकर यह अनुमान लगा लिया कि ब्रजराजनन्दन किसी अन्य नायिकाके साथ रमण करते हुए देखनेके कारण ही यह उदास एवं मौन हैं, इसलिए कुछ बोल नहीं रही हैं। श्रीराधा विलाप कर उठीं—जनार्दन हैं न—लोगोंको पीड़ा देना ही तो उनका काम है—अतः मुझे भी पीड़ित कर रहे हैं। विप्रलब्धा नायिका—निरन्तर अभिवर्द्धित अनुरागके कारण नायिका दूतीको भेजकर पहले किसी संकेत-स्थल पर पहुँच जाती है, परन्तु दैवयोगसे निर्दिष्ट समय बीत जानेपर भी नायक वहाँ उपस्थित न हो तो वह नायिका विप्रलब्धा कहलाती है। प्रस्तुत श्लोकमें उपेन्द्रवज्रा छन्द है।