भारतकोश
गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary

महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished448 पृष्ठ

पृष्ठ 269, कुल 448 में से

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सप्तमः सर्गः—नागर-नारायणः २३७ अथ चतुर्दशः सन्दर्भः। गीतम् ॥१४॥ वसन्तरागयतितालाभ्यां गीयते। अनुवाद—यह चौदहवाँ प्रबन्ध वसन्त राग तथा यति तालके द्वारा गाया जाता है। समर-समरोचित-विरचित-वेशा, दलित-कुसुम-दर विलुलित केशा। कापि मधुरिपुणा विलसति युवतिरधिकगुणा ॥१॥ध्रुवम् अन्वय—हे सखि स्मर-समरोचित-विरचित-वेशा (स्मरसमरस्य उचितो विरचितो वेशो यया सा) [ततश्च रणावेशेन] दलित- कुसुम-दर-विलुलित-केशा (दलितानि विमर्दितानि कुसुमानि येभ्यः तादृशाः दरविलुलिताः ईषद्विस्रस्ताः केशा यस्याः तादृशी) कापि अधिकगुणा (मत्तेऽपि अधिकगुणवती) युवतिः मधुरिपुणा सह विलसति ॥१॥ अनुवाद—सखि! मदन-समरके योग्य वेशभूषाका परिधान किये हुए और अनङ्ग-रसके आवेशमें कबरी-बन्धन आलुलायित होने (बिखर जाने) के कारण कुसुमसमूह विगलित होनेसे विमर्दित केशोंवाली मुझसे भी अधिक गुणशालिनी कोई युवती मधुरिपुके साथ सुखपूर्वक विलास कर रही है। पद्यानुवाद— स्मर-समरोचित-विरचित-वेशा। गलित-कुसुम-वर-विलुलित-केशा ॥ शोभित है युवती री कोई। हरि से विलास रही जो खोई ॥ बालबोधिनी—आशंकिता श्रीराधा सखीसे कहती हैं—हे सखि ! मुझसे भी अधिक कोई सुन्दर रमणी काम-संग्रामके अनुकूल वेश धारणकर मधुरिपुके साथ विलास कर रही है।

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