भारतकोश
गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary

महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished448 पृष्ठ

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२३८ श्रीगीतगोविन्दम् रतिक्रीड़ामें उसके केशपाश ढीले होकर इधर-उधर लहरा रहे हैं, उसमेंसे ग्रंथित पुष्प भी झर गये हैं। मधुरिपु—श्रीकृष्ण माधुर्यके शत्रु हैं, उनको माधुर्यका भान ही नहीं है। इसलिए वे मेरी उपेक्षा करके किसी दूसरी युवतीके साथ रतिविलासमें लिप्त हैं। युवतिरधिकगुणा—वह ब्रजरमणी मुझसे भी अधिक गुणशालिनी है, पर यह तो संभव ही नहीं है। अधिक गुणोंका व्यंगार्थ है—कम गुणोंवाली युवती रमण कर रही है, यह बड़े आश्चर्यकी बात है। इससे विपरीत रति सूचित होती है। विपरीत रतिमें युवतीका ही रतिकर्तृत्व रहता है। स्मरसमर—रतिकेलिको स्मर-समर कहा गया है। रतिक्रीड़ामें रति-विमर्दन आदि क्रिया होती है, जिससे नायिकाका कबरी बन्धन खुल जाता है, उसमें सन्निहित पुष्प झर जाते हैं, विश्रृंखलित हो जाते हैं। हरि-परिरम्भण-वलित-विकारा। कुच-कलशोपरि तरलित-हारा ॥ कापि मधुरिपुणा... ॥२ ॥ अन्वय—[अतःपरं षड्भिः तामेव विशिनष्टि] हरि-परिरम्भण- वलितविकारा (हरेः परिरम्भणेन आलिङ्गनेन वलितः रचितः विकारः रोमाञ्चादि-कामज-विकृतिर्यस्याः तादृशी) [तथा] कुच-कलसोपरि (स्तनकुम्भयोरुपरि) तरलित-हारा (तरलितः आन्दोलितः हारो यस्यास्तादृशी) [कापि अधिकगुणा इत्यादि प्रत्येकेन योजनीयम्] ॥२ ॥ अनुवाद—श्रीकृष्णका प्रगाढ़ रूपसे आलिङ्गन करनेपर मदन-विकारसे विमोहित उसमें रोमांच आदि विकार उत्पन्न हो गये होंगे और उसके कुचकलशों पर हार दोलायमान हो रहा होगा। पद्यानुवाद— हरि-परिरंभण-वलित-विकारा। कुच-कलशोपरि-तरलित-धारा ॥