भारतकोश
गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary

महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished448 पृष्ठ

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सप्तमः सर्गः-नागर-नारायणः २३९ शोभित है युवती री कोई। हरिसे विलस रही जो खोई॥ बालबोधिनी—श्रीराधा आनुमानिक तौर पर उस रमणीकी चेष्टाओंको चित्रित करते हुए कहती हैं कि श्रीकृष्णके द्वारा आलिङ्गित होनेसे उस युवतीमें कामोचित रोमांचादि मदन-विकार उद्भूत हो गये होंगे। कलश सरीखे उन्नत स्तनोंपर हार दोलायमान हो रहा होगा। हारकी चञ्चलता रतिकालमें युवती द्वारा रतिकर्तृत्व अथवा विपरीत रतिमें ही संभव है। विचलदल-कललितानन-चन्द्रा। तदधर-पान रभस-कृत-तन्द्रा ॥ कापि मधुरिपुणा... ॥३ ॥ अन्वय-विचलदलक-ललितानन-चन्द्रा (विचलद्भिः अलकैः चूर्णकुन्तलैः ललितः सुन्दरः आननमेव चन्द्रो यस्यास्तादृशी) [तथा] तदधर-पान-रभस-कृत-तन्द्रा (तस्य कृष्णस्य अधरपान- रसभेन अधरपानावेशेन कृता तन्द्रा आनन्द-निमीलनं यस्याः तादृशी) ॥३॥ अनुवाद—उसका मुखचन्द्र घुँघराली अलकावलियोंसे सुललित हो रहा होगा और श्रीकृष्णकी अधर-सुधाका पान करनेकी अतिशय लालसाके कारण नयनयुगल आनन्दपूर्वक निमीलित हो रहे होंगे। पद्यानुवाद- अलक-ललित मृदु आनन चन्द्रा। अधर-पान-मुद अधिकृत तन्द्रा ॥ शोभित है युवती री कोई। हरिसे विलस रही जो खोई ॥ बालबोधिनी—उस रमणीका मुखचन्द्र चंचल अलकावलियोंके कारण और भी अधिक शोभाशाली दीखता होगा। रति कालमें श्रीकृष्णकी अधर-सुधाका पान कर रतिजन्य आनन्दमें