गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)
Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary
महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२४० श्रीगीतगोविन्दम् निमग्न आँखें बन्द करके वह कपट निद्राका मिथ्या अभिनय कर रही होगी। चञ्चल-कुण्डल-ललित-कपोला। मुखरित-रसन-जघन-गति-लोला॥ कापि मधुरिपुणा...॥४॥ अन्वय—चञ्चल-कुण्डल-ललित-कपोला (चञ्चलाभ्यां तदधर-पानावेषादिति भावः कुण्डलाभ्यां ललितौ परममनोहरौ कपोलौ यस्याः सा) [तथा] मुखरित-रसन-जघन-गति-लोला (मुखरिता शब्दायमाना रसना काञ्ची यस्मिन् तादृशस्य जघनस्य गतिः तया लोला चपला)॥४॥ अनुवाद—कुण्डल-युगल चञ्चल होनेपर उसके कपोल- तलकी शोभा और भी बढ़ रही होगी, कटितट पर विराजमान मणिमय मेखलाकी क्षुद्र घण्टिकाएँ उसके जघन स्थल पर आन्दोलित होनेके कारण सुमधुररूपसे मुखरित हो रही होंगी। पद्यानुवाद— चंचल कुंडल ललित कपोला। मुखरित रसन जघन गति लोला॥ शोभित है युवती री कोई। हरिसे विलस रही जो खोई॥ बालबोधिनी—रतिक्रीड़ामें संलग्न उसके कुण्डल-युगलोंका आन्दोलित होना स्वाभाविक ही है—इससे उसके कपोलोंकी मनोहरता और भी बढ़ गयी होगी, मेखलामें संलग्न घुँघरू बार-बार बजते होंगे, जाँघोंका सदा संचलन होनेके कारण वह अति चंचल प्रतीत होती होगी। दयित-विलोकित-लज्जित-हसिता। बहुविध-कूजित-रति-रस रसिता— कापि मधुरिपुणा...॥५॥