गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)
Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary
महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसप्तमः सर्गः—नागर-नारायणः २४१ अन्वय—दयित-विलोकित-लज्जित-हसिता (दयितस्य प्रियस्य विलोकितेन वीक्षणेन-लज्जितं लज्जायुक्तं हसितं हास्यं यस्याः तथोक्ता) [तथा] बहुविध कूजित-रति-रस-रसिता (बहुविधं पारावतादिवत् कूजितं यस्यां तादृशी या रतिः तस्या रसेन आस्वादेन रसिता रसपूर्णा) ॥५॥ अनुवाद—दयित श्रीकृष्णके द्वारा अवलोकित होने पर वह लज्जित होती होगी, हँसती होगी, रतिकालमें रतिसरसिता होकर कोकिल कलहंसादिके समान मदनविकार सूचक 'सीत्कार' शब्द करती होगी। पद्यानुवाद— हरि-आलोकित-लज्जित-हँसिता। बहु विधि कूजित रति-रस-रसिता ॥ शोभित है युवती री कोई। हरिसे विलस रही जो खोई ॥ बालबोधिनी—प्रियतम श्रीकृष्ण जब तृप्त होकर उसकी ओर देखते होंगे, तब वह लज्जित होकर गर्दन झुका लेती होगी, हँसती होगी, रतिरसातिरेकके कारण वह पक्षियों—कोकिल, कलहंसके समान विविध प्रकारकी मधुर सीत्कार ध्वनि करती होगी। विपुल-पुलक-पृथु-वेपथु-भङ्गा। श्वसित-निमीलित-विकसदनङ्गा— कापि मधुरिपुणा... ॥६॥ अन्वय—विपुल-पुलक-पृथु-वेपथु-भङ्गा (विपुलाः पुलकाः पृथुः महान् वेपथुः कम्पश्च तेषां भङ्गाः तरङ्गाः यस्याः तादृशी) [तथा] श्वसित-निमीलित-विकसदनङ्गा (श्वसितेन निमीलितेन च विकसन् आविर्भवन् अनङ्गः मदनः यस्याः तादृशी) ॥६॥ अनुवाद—अनंग-रससे पुलकित हो उसके रोमांच एवं