गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)
Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary
महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा
पृष्ठ 274, कुल 448 में से
संदर्भ में पढ़ें२४२ श्रीगीतगोविन्दम् कम्प ही उसके तरंगके समान हैं। सघन निःश्वास एवं नेत्र-निमीलनके द्वारा वह मदन-आवेश प्रकाशित करती होगी। पद्यानुवाद— विपुल पुलक पृथु वेपथु भंगा। श्वसित निमीलित उदित अनंगा ॥ शोभित है युवती री कोई। हरिसे विलस रही जो खोई ॥ बालबोधिनी—रतिकालमें पुलकावलियोंसे, कम्पनसे, स्वरभंग होनेसे वह लम्बी-लम्बी श्वासोच्छ्वास करती होगी, आनन्द प्राप्ति होने पर आँखें मूँद लेती होगी, जिससे उसका काम विकसित होता होगा। वेपथुभङ्ग—प्रस्तुत श्लोकमें रोमाञ्च तथा कम्पको तरंग सदृश इसलिए बताया है कि जिस प्रकार जलाशयमें एकके बाद दूसरी तरंग उत्पन्न होती है, उसी प्रकार उसके शरीरमें भी रोमांच तथा कम्प उत्तरोत्तर उत्पन्न होते होंगे।
श्रमजल-कण-भर-सुभग-शरीरा। परिपतितोरसि रति रण-धीरा ॥ कापि मधुरिपुणा... ॥७॥ अन्वय—श्रम-जल-कण-भर-सुभग-शरीरा (श्रमजलकणभरेण सुरतश्रमजात-स्वेदवारिबिन्दुसमूहेन सुभगं सुन्दरं शरीरं यस्याः सा) [तथा] रतिरणधीरा (सुरतसंग्रामे धीरा पण्डिता) [निःसहता- विस्मृत-स्वाङ्गानुसन्धानतया] उरसि (कान्तस्य वक्षसि) परिपतिता ॥७॥ अनुवाद—रतिरसनिपुण वह कामिनी सुरत-क्रीड़ा जन्य पसीनेकी बूँदोंसे और भी सुन्दर लगती होगी, रतिक्रियामें धैर्य धारण करनेवाली वह रतिश्रमश्रान्ता श्रीकृष्णके वक्षःस्थल पर निपतिता होकर कितनी शोभा पा रही होगी।