गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)
Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary
महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसप्तमः सर्गः-नागर-नारायणः २४३ पद्यानुवाद- श्रमजल कण भर सुभग शरीरा। हरि-उर पतित सुरति रणधीरा॥ शोभित है युवती री कोई। हरिसे विलस रही जो खोई॥ बालबोधिनी-अनंग आवेशमें वह पूर्ण रूपसे थक गयी होगी। सुरतायासजन्य श्रमबिन्दुओंसे उसका मुखारविन्द कैसा चमकता होगा? स्वयंको विस्मृत होकर सुरतक्रियारूपी रणमें दक्ष वह श्रीकृष्णके वक्षःस्थलपर गिर गयी होगी, उसकी शोभा कैसी अद्भुत हो रही होगी। श्रीजयदेव-भणित-हरि-रमितम् । कलि-कलुष जनयतु परिशमितम्- कापि मधुरिपुणा... ॥८॥ अन्वय-श्रीजयदेव-भणित-हरि-रमितं (श्रीजयदेवेन भणितं यत् हरिरमितं हरेः रमणं) [भक्तानां] कलिकलुषं (कामादिकं) परिशमितं जनयतु ॥८॥ अनुवाद-कवि जयदेव द्वारा वर्णित यह हरि-रमण-विलास रूप रतिक्रीड़ा सबका कलि-कल्मष अर्थात् कामवासनाको शान्त करे। पद्यानुवाद- श्रीजयदेव कथित यह लीला। कलि-मल सहज विनाशनशीला ॥ शोभित है युवती री कोई। हरिसे विलस रही जो खोई ॥ बालबोधिनी-गीतगोविन्दके इस चौदहवें प्रबन्धका नाम हरिरमितचम्पकशेखर है। इस प्रबन्धमें विपरीत रतिका वर्णन है। रति-व्यापारका यह वर्णन अति पवित्र है। यह पाठकों तथा श्रोताओंके कलिदोषजन्य काम-विकारका प्रक्षालन करे।