गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)
Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary
महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२४४ श्रीगीतगोविन्दम् विरह-पाण्डु-मुरारि-मुखाम्बुजद्युतिरयं तिरयन्नपि वेदनाम्। विधुरतीव तनोति मनोभुवः सुहृदये हृदये मदनव्यथाम्॥ इति चतुर्दशः सन्दर्भः। अन्वय—[अथ चन्द्रं पश्यन्ती तं श्रीकृष्णमुखत्वेन उद्भाव्य तत्र अन्यया सह वर्त्तमानस्यापि मद्विरहेण पाण्डुत्वस्फुत्त्या स्वस्मिन् तस्य अतिप्रणयितां स्मरन्ती चन्द्रमाक्षिपति]—अये (खेदे) मनोभुवः (कामस्य) सुहृत् (मित्रभूतः) विरहपाण्डु-मुरारि- मुखाम्बुजद्युतिः (विरहेण मम विच्छेदेन पाण्डु यत् मुरारेः कृष्णस्य मुखाम्बुजं तस्य द्युतिरिव द्युतिर्यस्य तथाभूतः) [अतएव] वेदनां (सन्तप्तानां मनोव्यथां) तिरयन्नपि (आच्छादयन् निराकुर्वन्नपीत्यर्थः, चन्द्रदर्शनेन श्रीकृष्णमुखदर्शनजनितानन्दलाभादिति भावः) अयं विधुः (चन्द्रः) हृदये अतीव मदनव्यथां (कृष्णस्य अदर्शन-जनितामिति भावः) तनोति (विस्तारयति) [मदन-सुहृत्त्वेन तन्मुखस्मारकतया चन्द्रो मां व्यथयतीत्यभिप्रायः] ॥१॥ अनुवाद—प्रिय सखि! मेरे विरहमें पाण्डुवर्ण हुए श्रीमुरारीके मुखकमलकी कान्तिके समान धूसरित यह चन्द्रमा मेरी मनोव्यथाको तिरोहित कर कामदेवके सुहृद्भूत मेरे हृदयमें मदन-सन्तापकी अभिवृद्धि कर रहा है। बालबोधिनी—श्रीराधाने विलाप करते हुए सारी रात बितायी। जब चन्द्रमाको अस्ताचलकी ओर जाते देखा, तब अपने प्रति श्रीकृष्णके पूर्वरागका स्मरण कर अपनी प्रिय सखीसे कहने लगी—अरे सखि! कितने कष्टकी बात है। यह जो चन्द्रमा है, सन्तप्त व्यक्तियोंकी विरह-व्यथाको और भी बढ़ा रहा है। अब यह अस्तमित हो रहा है, जिससे मेरा मदनताप तिरोहित हो रहा है। इसके पाण्डुवर्णको देखकर मुझे श्रीहरिके मुखकमलका स्मरण हो रहा है—मेरे विरहमें वे कैसे निष्प्राण हो गये होंगे? अन्य प्रकारसे अनुमान करती हुई कहती हैं कि श्रीहरि मेरा परित्याग कर किसी दूसरी रमणीके साथ रमण कर रहे हैं, इसलिए उनकी ढलते चन्द्रमा जैसी कान्ति हो गयी है, यही कारण है कि हृदयमें सन्ताप और अधिक गहरा गया है।