भारतकोश
गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary

महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished448 पृष्ठ

पृष्ठ 277, कुल 448 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 277

सप्तमः सर्गः—नागर-नारायणः २४५ पञ्चदशः सन्दर्भः। गीतम् ॥१५ ॥ गुर्जरीरागैकतालीतालेन गीयते। अनुवाद—गीत-गोविन्द काव्यका यह पन्द्रहवाँ प्रबन्ध गुर्जरी राग तथा एकताली तालसे गाया जाता है। इस गीतिमें श्रीकृष्णके साथ विलास करनेवाली रमणीको स्वाधीन-भर्त्तृकाके रूपमें दिखाया गया है, जो यमुना-पुलिनमें श्रीकृष्णके साथ विलास-परायणा है। समुदित-मदने रमणी-वदने चुम्बन-वलिताधरे। मृगमदतिलकं लिखति सपुलकं मृगमिव रजनीकरे॥ रमते यमुना-पुलिन-वने विजयी मुरारिरिधुना ॥१ ॥ध्रुवम् अन्वय—[पुनस्तस्या एव स्वाधीन-भर्त्तृकत्वं सूचयन् तल्लीलाविशेषमाह] —अधुना (इदानीं) विजयी (जयशीलः मण्डनादि-कौशलेन सर्वातिशायी) मुरारिः (श्रीहरिः) यमुनापुलिनवने (यमुनायाः पुलिनवर्त्तिनि कानने) [तया सह] रमते (क्रीड़ति); [तथाच] समुदितमदने (समुदितः सम्यक् वृद्धिंगतः मदनः यस्मात् तस्मिन् कामोद्दीपके इत्यर्थः; चन्द्रपक्षेऽपि स एवार्थः) चुम्बन-वलिताधरे (वदनपक्षे तिलकं लिखित्वा साध्विदं वदनमित्युक्त्वा चुम्बनाय वलिता विन्यस्तः अधरो यत्र, चन्द्रपक्षे चुम्बनेन वलितो युक्तोऽधरः यस्मात् इत्यर्थः) रमणी-वदने (तस्या एव कामिन्याः वदने) रजनीकरे (चन्द्रे) मृगमिव सपुलकं (सरोमाञ्चं स्पर्शेन जातरोमाञ्चं यथास्यात् तथा) मृगमदतिलकं (मृगमदस्य कस्तूरिकायाः तिलकं) लिखति (ददाति) ॥१ ॥ अनुवाद—रतिरणमें विजयी मधुरिपु यमुना-पुलिनके वनमें प्रियाके साथ रमण कर रहे हैं, पुलकावलियोंसे पूर्ण कामकी उद्दीपन-स्वरूपा उस रमणीके वदनमें चन्द्रमण्डलके ऊपर मृगलाञ्छनकी भाँति कस्तूरी तिलककी रचना कर रहे हैं एवं रोमाञ्चित हो उसका चुम्बन कर रहे हैं।