भारतकोश
गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary

महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished448 पृष्ठ

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२४६ श्रीगीतगोविन्दम् पद्यानुवाद— यमुन-पुलिनके सघन कुंजमें रमते आज मुरारी। प्रियकी अमर सुहागिनी होकर जीती बाजी हारी॥ रचते मृगमद तिलक पुलक कर मदन-मुदित मुख उसके। चुम्बन वलित अधर लगते हैं, मधुर रसातुर जिसके॥ बालबोधिनी—श्रीराधा अपनी कल्पनाओंके वितानमें प्रलाप करती हुई कहती हैं—(विरहमें भाव-नेत्रों द्वारा अपनी पूर्व लीलाका स्मरण कर उसीका वर्णन करती हैं) इस कामसंग्राममें मधुरिपु मुझे पराभूतकर इस समय निकुंजमें विजय-उत्सव मना रहे हैं। श्रीराधा उस काल्पनिक रमणीका स्वरूप बताते हुए कहती हैं कि यमुनापुलिनके वनमें श्रीकृष्ण मण्डनादि कला-कौशलके द्वारा उस रमणीके साथ क्रीड़ा कर रहे हैं। उस रमणीके मुख-कमल पर मृगमदसे तिलककी रचना कर रहे हैं, जिससे वह अति पुलकित हो रही है। चुम्बनकी अभिलाषासे श्रीकृष्णने उसका मुख अपने सम्मुख कर लिया है, उसमें काम पूर्ण रूपसे उदित हो गया है, श्रीकृष्ण भी अति रोमाञ्चित हो रहे हैं, वे अपनेको संभाल नहीं पा रहे हैं, बड़ी कठिनाईसे टेढ़ा-मेढ़ा तिलक रच रहे हैं। उसकी शोभा ऐसी हो रही है, मानो चन्द्रमण्डलके ऊपर मृगलाञ्छन हो। उसके अधर एवं मुखमण्डल पर चुम्बन करनेसे श्रीकृष्णके अधर-पुटोंमें उस तिलकका चिह्न अङ्कित हो गया है। घनचय-रुचिरे रचयति चिकुरे तरलित-तरुणानने। कुरुबक-कुसुमं चपला-सुषमं रतिपति-मृग-कानने— रमते यमुना-पुलिन वने..... ॥२॥ अन्वय—[न केवलं तस्या वदने तिलकं लिखति अपितु]—घनचय-रुचिरे (मेघचयवत् रुचिरे शोभने) तरलित- तरुणानने (तरलितं, चञ्चलितं तद्गुणवर्णने मुखरीकृतमित्यर्थः