गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)
Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary
महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसप्तमः सर्गः-नागर-नारायणः २४७ तरुणस्य श्रीहरेः आननं मुखं येन तत्र) [तथा] रतिपति-मृगकानने (रतिपतिः कामएव मृगः तेन सदाश्रितत्वात् तस्य कानने विचरणस्थाने, कामोद्दीपके इतिभावः) [तस्याः] चिकुरे (कुन्तले) चपला-सुषमं (चपलाया विद्युत्इव सुषमा परमा शोभा यस्य तादृशं) कुरुबककुसुमं (रक्तझिण्टीपुष्पं) रचयति (तत्पुष्पैः तस्याः कवरीं ग्रथनातीत्यर्थः) ॥२॥ अनुवाद—मदन-मृगके विहार-कानन-स्वरूप उस युवतिके मेघ-समूहके समान मनोहर कुन्तल (केशपाश) हैं, जिससे उसका तरुण करुण आनन सतत उल्लसित होता है, उनमें वे कुरुवक कुसुम सन्निवेशित कर रहे हैं। पद्यानुवाद— गोरे मुखपर श्याम तिलकने ऐसी ही छवि धारी। मिरग साथ ज्यों खिल उठती है चन्दाकी उजियारी॥ चपलसे, कुरुबक कुसुमोंसे, सजल मेघसे काले— केशोंको उसके सजते हैं, भीगेसे मतवाले॥ यमुन-पुलिनके सघन कुंजमें रमते आज मुरारी। प्रियकी अमर सुहागिनि होकर जीती बाजी हारी॥ बालबोधिनी—श्रीराधा अपनी सखीसे श्रीकृष्णकी शृङ्गार- क्रीड़ाका विवरण करती हुई कहती हैं—उन्होंने केवल उसके ललाट पर ही तिलक रचना की हो, केवल ऐसा ही नहीं है, अपितु कनेर पुष्पोंसे उसके केशोंकी भी सज्जा की है। उसके बाल इस प्रकार काले, स्निग्ध, घने एवं घुँघराले हैं, मानो कोई सजल मेघोंका समूह हो। वह केशपाश ऐसा लगता है, मानो कामदेवरूपी मृगके निर्भय घूमनेके लिए घना कानन हो। इस केशपाशके अवलोकन मात्रसे ही युवकोंका मन चञ्चल हो जाता है। श्रीहरिके द्वारा रमणीके केशपाशमें सुसज्जित कुरुवकके पुष्प विद्युतकी अतिशय छटाको धारण कर रहे हैं।