गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)
Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary
महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा
पृष्ठ 280, कुल 448 में से
संदर्भ में पढ़ें२४८ श्रीगीतगोविन्दम् घटयति सुघने कुच-युग-गगने मृगमद-रुचिरुषिते । मणिसरममलं तारक-पटलं नख-पद-शशि-भूषिते ॥ रमते यमुना-पुलिन वने..... ॥३॥ अन्वय—सुघने (निविड़े; शोभनमेघयुक्ते च) नखपद-शशि- भूषिते (नखपदं नखक्षतं तदेव शशी तेन भूषिते) [तथा] मृगमद-रुचि-रूषिते (मृगमदस्य कस्तूरिकायाः या रुचिः कान्तिः तया रूषिते म्रक्षिते; गगनपक्षे कस्तूरीदीप्त्यैव म्रक्षिते) कुचयुग-गगने (कुचयुगमेव वृहत्त्वात् गगनं (तत्र) अमलं (निर्मलम् उज्ज्वलमिति यावत्) मणिसरं (मुक्ताहारं) [एव] तारक-पटलं (नक्षत्रराजिं) घटयति (योजयति) ॥३॥ अनुवाद—उस सुकेशीके गाढ़ नीलवर्णा कस्तूरीकी धूलिसे रुषित (विलेपित) परस्पर नितान्त सन्निहित विशाल कुचयुग- मण्डलरूप गगन जो अर्द्धचन्द्राकार नखक्षतसे परिशोभित है, उस पर निर्मल तारक-दलके समान मनोहर मणिमय हारको अर्पित कर रहे हैं। पद्यानुवाद— मृगमद-रंजित कुच-युग-गगने, नखपद शशिसे विलसे। चमक रहे मणि-हार अमल अति, चम-चम तारक-दलसे ॥ यमुन-पुलिनके सघन कुंजमें, रमते आज मुरारी। प्रियकी अमर सुहागिनि होकर, जीती बाजी हारी॥ बालबोधिनी—श्रीराधा कह रही हैं कि नखके अर्द्धचन्द्राकार चिह्नोंसे विभूषित उस रमणीके वक्षस्थलपर मणियोंकी मालारूप तारासमूह विन्यस्त कर रहे हैं। आकाश तथा स्तनद्वयमें एक विचित्र ही मनोरम अन्विति है। कुचयुगगगने—दोनों स्तन उस प्रकार विस्तृत हैं, जैसे आकाश विस्तृत होता है। आकाशके बिम्बसे स्तनोंके पीनत्वकी प्रतीति करायी गयी है। सुघने—परस्पर सन्निहित उस नायिकाके स्तन अति कठोर हैं, जैसे आकाश सघन सुन्दर बादलोंसे युक्त होता है।