भारतकोश
गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary

महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished448 पृष्ठ

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सप्तमः सर्गः - नागर-नारायणः २४९ मृगमदरुचिभूषिते-सुरतजन्य श्रमके कारण स्तनोंपर स्वेदविन्दु क्षरित होते हैं, तब उन्हें सुखानेके लिए कस्तूरीके चूर्णको मला जाता है, गगन भी तो कस्तूरीवत् नील कान्तियुक्त होता है। तारकपटलं नखपद शशिभूषिते-उस सुकेशीके कुच युगल रूपी गगनमें तारोंके समुदाय सदृश मुक्ता सरोवर परिलक्षित हो रहा है। उसमें श्रीकृष्णके नखोंके अग्रभागके आघातसे विभूषित चिह्न अर्द्धचन्द्राकारकी शोभाको प्राप्त हो रहे हैं। उसके स्तनमण्डलको श्रीकृष्ण मोतियोंकी मालारूपी ताराओंसे सजा रहे हैं। ये सम्पूर्ण उपमान एक सुन्दर बिम्ब-योजना है। तिलक मृग है, ललाट चन्द्रमा है और केशपाश अभयारण्य बन गया है। कुरुवकके फूल बिजलीकी चमक एवं वक्षस्थल आकाश हो गया है। नख-क्षत चन्द्रमा एवं छोटी-छोटी मणियाँ ताराओंके रूपमें सुशोभित हुई हैं। जित-विस-शकले मृदु-भुज-युगले करतल-नलिनी-दले। रकत-वलयं मधुकर-निचयं वितरति हिम-शीतले ॥ रमते यमुना-पुलिन वने..... ॥४॥ अन्वय-जित-विस-शकले (जितानि विसशकलानि मृणालखण्डानि येन तादृशे) करतल-नलिनीदले (करतलमेव नलिनीदलं पद्मपत्रं यत्र तस्मिन्) [तथा] [सम्भोगिन्याः कामतापराहित्यात्] हिमशीतले (हिमवत् शीतले) मृदुभुजयुगले (कोमलबहुद्वये) मधुकर-निचयं (भ्रमरपङ्क्तिम्) [एव] मरकतवलयं (मरकतमयं वलयं) वितरति (परिधापयति) ॥४॥ अनुवाद-सुकेशी, पीनस्तनी उस रमणीके मृणालदण्डसे भी सुशीतल भुजयुगल जिनमें उसके सुकुमार करतलरूपी नलिनी-दल सुशोभित हो रही हैं, उनमें वे भ्रमर-सदृश मरकतमय वलयरूपी कंगन धारण करा रहे हैं।