गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)
Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary
महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२५० श्रीगीतगोविन्दम् पद्यानुवाद— तालखण्डसे युग भुज, करतल राजित नलिनी दलसे। पहिनाते मरकत-कंकण जो लगते छाये अलिसे॥ यमुन-पुलिनके सघन कुंजमें रमते आज मुरारी। प्रियकी अमर सुहागिनि होकर जीती बाजी हारी॥ बालबोधिनी—श्रीराधा कह रही हैं—उस भाग्यशालिनीकी दोनों भुजाएँ कोमलतामें मृणालदण्डको भी मात कर देनेवाली हैं। सुकुमार गौर वर्ण, हिमके समान दोनों हाथोंकी सुशीतल हथेलियाँ कमलके समान लाल-लाल हैं। जिस प्रकार लाल कमल-दलोंके ऊपर नीले-नीले भौंरे अत्यन्त अभिराम प्रतीत होते हैं, उसी प्रकार उसके करतलोंमें श्रीकृष्ण नीलमणिजड़ित कंगनरूपी भौंरे धारण करा रहे हैं। कोमल बाहोंमें ये कंगन ऐसे सुशोभित होते हैं मानो उन हाथोंको घेरकर भौंरे एक कली-पंक्ति बना रहे हों। हिमशीतले—सम्भोगकारिणी रमणीका भुजयुगल श्रीकृष्णके स्पर्शसे काम-ताप शून्य होकर हिमवत् शीतल हो गया है अथवा उस रमणीमें कामका अभाव है—यह भी सूचित होता है। उसके ठण्डे हाथोंमें यह कंगन एक नया ताप प्रदान करेगा। रति-गृह-जघने विपुलापघने मनसिज-कनकासने। मणिमय-रसनं तोरण-हसनं विकिरति कृत-वासने॥ रमते यमुना-पुलिन वने.....॥५॥ अन्वय—विपुलापघने (विपुलम् अपघनम् अङ्गम् आयतन- मित्यर्थः यस्य तादृशे विशाले इत्यर्थः) मनसिज-कनकासने (मनसिजस्य कामस्य कनकासने स्वर्णपीठे) [तथा] कृतवासने (कृता वासना लीला-विशेषवासना येन तादृशे दृष्टमात्रेणैव कामोद्दीपके इत्यर्थः) [तस्याः] रतिगृहजघने (रतेः शृङ्गारस्य गृहम् आश्रय एव जघनं कटि-पुरोभागः नितम्बो वा तस्मिन्)