गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)
Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary
महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसप्तमः सर्गः—नागर-नारायणः २५१ तोरणहसनं (तोरणस्य बहिर्द्वारशोभार्थ माङ्गल्यस्रजः हसनम् उपहासः यस्मात् तत्; ततोऽप्यधिकमनोज्ञमित्यर्थः) मणिमयरसनं (मणिमयं रसनं काञ्चीं) विकिरति (निक्षिपति) [तत्स्पर्शाजात- कम्पतया अयथातथं विन्यस्यतीत्यर्थः] ॥५॥ अनुवाद—मांसल, सुगन्धित, विपुलतर कन्दर्पके सुवर्ण-पीठ- स्वरूपके समान रतिगृह तुल्य उस रमणीके जघन-स्थलमें मणिमय मेखलारूपी मंगल तोरण धारण करा रहे हैं। पद्यानुवाद— मनसिज कनकासन सम उसके मांसल रतिगृह-जघने। सजा रहे तोरण सम कांची (स्मित अंकित वर वदने) ॥ यमुन-पुलिनके सघन कुंजमें रमते आज मुरारी। प्रियकी अमर सुहागिनि होकर जीती बाजी हारी॥ बालबोधिनी—श्रीराधा कह रही हैं कि उस रमणीकी जाँघें रतिकेलिकी आश्रयस्वरूप हैं। विपुल, कमनीय एवं मांसलताको प्राप्त वह उरुस्थल कामदेवका सुवर्णरचित पीठस्वरूप है, जिसके अवलोकनसे ही श्रीकृष्णके मनमें मदन-लालसा जाग्रत हो जाती है। कृतवासनं—नायिकाएँ अपने अंगोंको एक विशेष प्रकारकी सुगन्ध-सिद्ध धूपसे सुवासित करती हैं, जिससे नायक उसके वशमें हो जाते हैं। उस रमणीने अपनी जाँघोंको इसी प्रकारसे सुवासित करके श्रीकृष्णको अपने वशमें कर लिया है। कनकासने—कामदेवका हेमपीठ। 'कनक' शब्दका अर्थ धतूरा भी होता है, जो शंकरजीको अति प्रिय है। श्रीशंकरने कामदेवको भस्मीभूत कर दिया था, अतः उनके प्रिय 'कनक' शब्दके प्रयोगके द्वारा कामकी उत्तेजनाको सूचित किया है। मणिमयरसनं तोरणहसनं—जब कोई राजा सिंहासनारूढ़ होता है, तो द्वारपर मंगलमय वन्दनवार सजाया जाता है।