भारतकोश
गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary

महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished448 पृष्ठ

पृष्ठ 284, कुल 448 में से

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२५२ श्रीगीतगोविन्दम् यहाँ कामरूप राजाके गौरवर्णनीय उरुस्थल रूपी हेमसिंहासन पर आरूढ़ होनेके लिए उसे मणिमय मेखलारूपी वन्दनवारसे श्रीकृष्ण सजा रहे हैं। विकिरति—उरु-स्थलके स्पर्शसे कन्दर्पजनित कम्पन भाव उदित होता है, अतः मणिमय मेखलाको ठीक-ठीक रूपसे धारण करानेमें समर्थ नहीं हुए। फिर भी पहनानेकी कोशिश की गयी है—एक लीलाविशेषकी भावना बन गयी है। चरण-किसलये कमला-निलये नख-मणिगण-पूजिते। बहिरपवरणं यावक-भरणं जनयति हृदि योजिते॥ रमते यमुना-पुलिन वने.....॥६॥ अन्वय—हृदि (वक्षसि) योजिते (विनिहिते) कमला-निलये (कमलायाः सौन्दर्याधिदेवतायाः श्रियाः निलये आवासे) नखमणिगण-पूजिते (नखा एव मणिगणाः तैः पूजिते अर्चिते) चरणकिशलये (पादपल्लवे) यावक-भरणं (यावकं अलक्तकमेव भरणम् आभरणं) बहिरपवरणं (बहिरावरणं) जनयति (करोति) [श्रीनिवासस्य मणियुतस्य च बहिरावृतिर्युक्तैवेत्यर्थः] [यद्वा कमलानिलये हृदि इत्येवमन्वयः कार्यः]॥६॥ अनुवाद—उस नितम्बिनीके अरुण मनोहरश्रीसे सम्पन्न एवं नखरूपी मणियोंसे विभूषित पद-पल्लवोंको नखक्षत एवं मणियोंसे समलंकृत एवं लक्ष्मीके वासस्थल अपने हृदयपर स्थापित करते हुए बड़े यत्नसे आवरण-आच्छादन करते हुए जावक-रससे रञ्जित कर रहे हैं। पद्यानुवाद— कमलाके समान आवास-हृदय पर पग उसके हैं धरते। और हाथसे 'जावक' रचना फिर मातल हो करते॥ बालबोधिनी—श्रीराधा श्रीकृष्णकी नवीन रति-केलिका वर्णन करते हुए कहती हैं—उस बड़भागिनीके चरण-कमल लक्ष्मीके आश्रय-स्वरूप हैं, रक्तिम वर्णके नवीन कोमल

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