गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)
Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary
महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपल्लवोंके समान हैं। उसके पद-नख मणियोंकी कान्तिको धारण किये हुए हैं, उन चरण-युगलको वे अपने हृदयमें संश्लिष्ट करके बैठे हैं, उनके उस वक्षःस्थलमें लक्ष्मी सदा निवास करती है। उनका वह वक्षःस्थल उस रति-निष्णाता रमणी द्वारा अर्पित नखक्षतों एवं मणिसमूहोंसे समलंकृत है। उसके उन स्वाभाविक अरुण वर्ण पदोंमें श्रीकृष्ण अपने करकमलोंसे महावर (आलक्तक रस) लगाकर बाह्य-आच्छादन- अलंकरण प्रदानकर बड़े यत्नसे उन्हें संरक्षण प्रदान कर रहे हैं। नखमणिपूजित विशेषण रमणी एवं श्रीकृष्ण दोनोंमें अन्वित होता है। रमयति सुभृशं कामपि सुदृशं खलहलधरसोदरे। किमफलमवसं चिरमिह विरसं वद सखि! विटपोदरे॥ रमते यमुना-पुलिन वने..... ॥७॥ अन्वय—सखि, खल-हलधर-सोदरे (खलः धूर्त्तः हलधरस्य बलदेवस्य सोदरः तस्मिन्; हलधरस्य इति सोल्लुण्ठनोक्तिः- लाङ्गलभृतः-सूतरामविदग्धस्य इत्यर्थः) कृष्णे कामपि सुदृशं (सुलोचनां कामिनीं) सुभृशं (प्रगाढं) रमयति [सति] इह विटपोदरे (वनमध्ये) अफलं (विफलं) विरसं (रसहीनं यथा तथा) किं (कथं) [अहम्] अवसम् (अवस्थितास्मि) [इत्येतत्] वद (कथय) [मामभिसार्य अन्या सह रमणात् हरेः खलत्वम्] ॥७॥ अनुवाद—हलधरके सहोदर, अविवेकी, गँवार, खल वे श्रीकृष्ण निश्चित रूपसे किसी सुनयनाका प्रगाढ़ आलिङ्गन कर उसके साथ रमण कर रहे हैं, तब सखि! तुम्हीं बताओ, मैं इस लतानिकुंजमें कब तक विरस भावसे बैठी-बैठी प्रतीक्षा करती रहूँ?