गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)
Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary
महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२५४ श्रीगीतगोविन्दम् पद्यानुवाद— ‘पापी’ के पर-तिय-विलासको देखूँ आँखें मींचे। कब तक विरस प्रतीक्षा सखि ! मैं करूँ विटपके नीचे ? यमुन-पुलिनके सघन कुंजमें रमते आज मुरारी। प्रियकी अमर सुहागिनि होकर जीती बाजी हारी ॥ बालबोधिनी—श्रीराधा प्रतीक्षा करती-करती नैराश्यको प्राप्त होकर अपनी सखीसे कहती हैं—सखि ! कुछ तो बोलो, मौनका त्याग करो, अब इस वनके लतानिकुंजमें व्यर्थ ही बहुत देर तक रुकनेसे क्या लाभ है ? 'खल हलधरसहोदरे'—हलधर बलरामजीका नाम है, उनका छोटा भाई कृष्ण, जो अतिशय खल है। हलधरका अर्थ होता है, हलवाहा। श्रीकृष्ण हलवाहेके समान ही खल, गँवार और अविदग्ध हैं। मेरी उपेक्षा कर, मुझे ठग कर उस सुलोचनाके साथ रमण कर रहे हैं। अरे, वह सुलोचना कैसी ? वे तो अपने जैसी किसी गँवार रमणीके साथ ही रमण कर रहे हैं, मेरा उनसे क्या लेना-देना ? मैं उन पर विश्वास स्थापनकर इस बीहड़ वनमें सारी रात बैठी रही, मेरी कितनी उपेक्षा की है। मैं इस कुंजमें दहकती रहूँ, क्या मैं उन्हें ढूँढती ही रहूँ? मेरे पास चारा क्या है? पर सखि ! कैसे सहन करूँ? उन्होंने यहाँ आनेकी बात कही थी, परन्तु वे तो अन्य प्रेयसीके साथ विलासपरायण हो रहे हैं। इस पन्द्रहवें प्रबन्धकी नायिका स्वाधीनभर्तृका है, जिसके गुणोंसे आकृष्ट होकर श्रीकृष्ण उसके सान्निध्यका त्याग न कर श्रीराधाकी उपेक्षा कर रहे हैं। इह रस-भणने कृत-हरि-गुणने मधुरिपु-पद-सेवके। कलि-युग-रचितं न वसतु दुरितं कविनृप जयदेवके ॥ रमते यमुना-पुलिन वने..... ॥८ ॥ अन्वय—रसभणने (रसस्य शृङ्गाररसस्य भणनं कथनं यत्र तस्मिन्) कृतहरिगुणने (कृतं हरेः गुणनं गुणकीर्त्तनं येन