गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)
Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary
महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसप्तमः सर्गः—नागर-नारायणः २५५ तादृशे) मधु-रिपु-पद-सेवके (श्रीकृष्णपदसेवके) इह (अस्मिन्) कविनृप-जयदेवके (कविश्रेष्ठ-जयदेवे) कलियुग-चरितं (कलि- युगधर्म-वशादाचरितं) दुरितं (पापं) न वसतु ॥८॥ अनुवाद—शृङ्गार-रससे परिपूर्ण श्रीकृष्णकी लीला-कथाओंका कीर्तन करनेवाले, मधुसूदनके सेवक मुझ कविराज जयदेवमें कलियुग आचरित दुरित दोष प्रविष्ट न हों। बालबोधिनी—श्रीजयदेव इस अष्टपदीकी संरचनामें स्वयंको मधुरिपुके सेवकोंमें सर्वश्रेष्ठ मानकर यह प्रार्थना करते हैं कि इस गीतिको सुननेवालोंमें कलियुगके दूषणीय चरित्र प्रविष्ट न हों। 'रसभणने' से तात्पर्य है—रसपूर्ण शृङ्गारिक उक्तियाँ कहनेवाला। 'हरिगुणने' से तात्पर्य है—श्रीहरिकी कथाओंका अभ्यास करनेवाले कविराज जयदेव। इस प्रबन्धमें आयी कविकी सभी उक्तियाँ रसकी उद्दीपना करानेवाली हैं। इस रसकी अभिव्यक्तिसे कलियुगके प्रभावसे तामसी चित्तवृत्तियाँ हृदयमें प्रविष्ट नहीं हो पाती हैं। इस प्रबन्धका नाम हरिरसमन्मथतिलक है, जिसे प्रबन्धराज कहा गया है। यह द्रुत ताल एवं द्रुत लयसे गाया जाता है। इसकी राग मल्हार है। नायातः सखि ! निर्दयो यदि शठस्त्वं दूति ! किं दूयसे ? स्वच्छन्दं बहुवल्लभः स रमते, किं तत्र ते दूषणम् ? पश्याद्य प्रिय-सङ्गमाय दयितस्याकृष्यमाणं गुणै रुत्कण्ठार्तिभरादिव स्फुटदिदं चेतः स्वयं यास्यति ॥१॥ इति पञ्चदशः सन्दर्भः। अन्वय—[इदानीं विषण्णवदनां सखीं सनिवेदमाह]—सखि, निर्दयः (दयाहीनः) शठः (धूर्त्तः अन्तरन्यत् बहिरन्यत्कारीत्यर्थः) यदि न आयातः हे दूति, त्वं किं (कथं) दूयसे (दुःखितासि) ? बहुवल्लभः (बह्व्यः वल्लभ्यः प्रेयस्यः यस्य सः कृष्ण)