गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)
Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary
महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२५६ श्रीगीतगोविन्दम् स्वच्छन्दं (निःशङ्कं) रमते; तत्र ते (तव) दूषणं किं (को दोषः); [इत्थं सखीमनूद्य निर्वेदभङ्ग्या आत्मनो दशमीदशामाह]— पश्य अद्य (इदानीं) दयितस्य (कृष्णस्य) गुणैः (सौन्दर्यादिभिः) [रज्जुभिश्चेति ध्वनिः; यथा कश्चित् रज्वाकृष्टः सन् याति तद्वत्] आकृष्यमाणम् इदं (तदप्राप्तितापोद्धनितधैर्यं) [मम] चेतः (चित्तम्) उत्कण्ठार्त्तिभरादिव (उत्कण्ठा औत्सुक्यम् आर्त्तिः पीड़ा च तयोः भरात् आधिक्यात् हेतोः) स्फुटत् इव (विदलदिव) स्वयं यास्यति ॥१॥ अनुवाद— सखी—हे सखि राधे! वे नहीं आये। श्रीराधा—वे निर्दय, निष्ठुर, शठ यदि नहीं आये तो तुम दुःखी क्यों हो रही हो? सखी—वे बहुवल्लभा हैं, स्वच्छन्दतापूर्वक रमण करते हैं। श्रीराधा—इसमें तुम्हारा क्या दोष है? देखो, आज मेरा मन उस प्राणकान्त प्रियतम श्रीकृष्णके गुणोंसे आकृष्ट होकर तथा उत्कण्ठाके भारसे विदीर्ण होकर उनसे मिलनेके लिए स्वयं ही जायेगा। बालबोधिनी—श्रीकृष्णके न आने पर इस विषण्णवदना दूतीको ही हेतु मानकर अत्यन्त विरह-व्यथाके साथ अपनी उत्कण्ठा प्रकट करती हुई रहती है। सखीने श्रीराधासे कहा—हे सखि राधे! उन अनेक प्रेयसियोंवालेको मैंने बहुत बुलाया, पर वे निर्दय आये ही नहीं। श्रीराधाने प्रत्युत्तरमें कहा—हे दूति! यदि वे शठ और धूर्त आये ही नहीं, तो इसमें तुम्हारा क्या दोष है? तुम दुःखी क्यों हो रही हो? तुमने अपना दौत्य-कर्म बहुत अच्छी प्रकारसे कर दिया। दूतीने कहा—मैं इसलिए दुःखी हो रही हूँ कि मैं उन्हें ला नहीं सकी। वे बहुबल्लभा हैं, उनकी अनेक प्रेयसियाँ हैं, वे स्वच्छन्द हैं, जहाँ मन चाहे, वहीं रमण करते हैं। पुनः श्रीराधाने कहा—तब तुम्हारा क्या दोष है? अब तुम देखना,