गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)
Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary
महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसप्तमः सर्गः - नागर-नारायणः २५७ मेरा चित्त उनके गुणोंसे आकर्षित होकर उनसे मिलनेके लिए असहनीय वेदनासे फट रहा है और इस पीड़ाका प्राण बनकर उन तक पहुँच जायेगा। कैसा चित्त है— स्वतः सिद्ध रूपसे श्रीकृष्णके गुणोंसे आकृष्ट। 'उत्कण्ठार्तिभराद्' से तात्पर्य है, प्रियमिलनकी इच्छा-पीड़ाके भारसे विदीर्ण चित्त। मेरे द्वारा रोके जाने पर भी रुकेगा नहीं। उनके पास पहुँचेगा ही। अथवा देखो, सखि ! इस समय दयितके साथ दूसरी रमणीके मिलन होनेसे उनकी प्राप्ति सम्भव नहीं है, फिर भी मेरी उत्कण्ठा प्रतिक्षण बढ़ती जा रही है। अथवा हरिके संगमसे पूर्वानुभूत स्मर-सुखको प्राप्त करनेवाला यह चित्त वहाँ जायेगा ही, इसमें न तुम्हारा दोष है और न मेरा। वह रमणी भी उपालम्भके योग्य नहीं है, विधाता ही विमुख हो गया है। अथवा इस प्रकार यह चित्त वहाँ जायेगा ही और निवृत्तिको प्राप्तकर उपरमित हो जायेगा। इस प्रकार श्रीराधा शान्त निर्वेदकी स्थितिमें श्रीकृष्णका गुणगान करती हुई दशमी दशाको प्राप्त हो गयीं। अपने गुणोंके द्वारा श्रीकृष्ण जिस रमणीका सुख-विधान करते हैं, उसे किसी प्रकारका कष्ट नहीं होता, श्रीराधा श्रीकृष्णकी प्राप्तिके अभावमें अति विपन्ना, विषण्णा अवस्थाको प्राप्त हो गयीं। प्रस्तुत श्लोकके पूर्वार्द्धमें श्रीराधाका सखीके साथ वचन-प्रतिवचन है। श्रीराधाके मनमें भाव यह है कि स्वयं यह दूती ही श्रीकृष्णको बुलाने गयी और उनके साथ रमण कर लौट आयी है। अतः वह कृष्णको शठ, निर्दय इत्यादि कहती है। कैसे गँवार हैं वे, नायिका और दूतीमें भी अन्तर नहीं जानते। प्रस्तुत श्लोकमें विक्रीड़ित छन्द है और काव्यलिङ्ग नामक अलङ्कार है।