गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)
Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary
महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२५८ श्रीगीतगोविन्दम् अथ षोडषः सन्दर्भः। गीतम् ॥१६॥ देशवराडीरागेण रूपकतालेन गीयते। अनुवाद—गीतगोविन्द काव्यका यह सोलहवाँ प्रबन्ध देशवराड़ी राग तथा रूपक तालमें गाया जाता है। अनिल-तरल-कुवलय-नयनेन । तपसि न सा किसलय-शयनेन ॥ सखि ! या रमिता वनमालिना ॥ध्रुवपदम् ॥१॥ अन्वय—[तद्गुणैरन्यस्याः सुखं वर्णयन्ती स्वस्यास्तदलाभात् निर्वेदेन श्लोकार्थमेव निश्चिनोति]—सखि, या, अतिल-तरल- कुवलय-नयनेन (अनिलेन वायुना तरले चञ्चले ये कुवलये नीलोत्पले तद्वत् नयने यस्य तेन) [उत्पलवत् शैत्यगुणेन तापोपशमनादिति भावः] वनमालिना रमिता (विविध- सम्भोग-केलिभिर्नन्दिता) सा किशलयशयनेन (पल्लवशयनैन) न तपति (सन्तापं न गच्छति सुखयत्येवेत्यर्थः)। [एवं सर्वत्र योजनीयम्] पक्षे या अरमिता सा किशलयशयने (पल्लवशय्यायां) न तपति इति न अपि तु तपत्येव [अतीवोद्दीपकत्वात् तस्य] ॥१॥ अनुवाद—पवनके द्वारा सञ्चालित इन्दीवर (कमल) के समान चञ्चल नयनवाले श्रीकृष्णके द्वारा जो वरयुवती रमिता हुई है, उसे किसलय शय्या पर शयन करनेसे किसी तापका अनुभव नहीं हुआ होगा। बालबोधिनी—इस अष्टपदीमें श्रीराधाकी ईर्षा और भी ज्वलित हो उठी है। वह सखीसे कहती है—हे सखि ! श्रीकृष्णके नयनयुगल इन्दीवर (नीलकमल) के समान चंचल हैं, मानो दक्षिण पवनसे संचालित हो रहे हों। वे श्रीकृष्ण जिसे रमण-सुख दे रहे हैं और स्वयं रमित हो रहे हैं, वह