गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)
Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary
महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसप्तमः सर्गः—नागर-नारायणः २५९ मेरी तरह किसलयके सेज पर भी क्यों झुलसेगी ? कैसे हृदय टूट जाता है, तार-तार हो जाता है, यह तो मैं जानती हूँ। इस तरह प्रस्तुत श्लोकमें श्रीराधा श्रीकृष्णके सुरत-सौशील्यका वर्णन कर उनकी स्तुति करती है। निन्दापरक अर्थ यह हो सकता है कि वन-लक्ष्मीकी शोभाका आनन्द लेनेमें लीन, संभोगपराङ्मुख वनमाली श्रीकृष्ण उस गोपीके साथ रमण नहीं कर सके। उनके नेत्र वायुके द्वारा नीलकमलके समान चञ्चल हो रहे थे। इन नेत्रोंके द्वारा उपभुक्त होनेसे वह गोपिका किसलय-रचित शय्या पर शयन करने मात्रसे ही सन्तप्त नहीं की गयी क्या? अवश्य ही की गयी। अथवा नील कमलके समान जिसके नेत्र हैं, ऐसी गोपी उन अन्यमनस्क, इधर-उधर दूसरी प्रियाको देखनेवाले श्रीकृष्णके द्वारा अवश्य ही सन्तप्ता हुई है। विकसित-सरसिज-ललित-मुखेन । स्फुटति न सा मनसिज-विशिखेन— सखि ! या रमिता... ॥२॥ अन्वय—विकसित-सरसिज-ललित-मुखेन (विकसितं यत् सरसिजं पद्मं तद्वत् ललितं मनोहरं मुखं यस्य तादृशेन) वनमालिना या रमिता, सा मनसिज-विशिखेन (मन्मथशरेण) न स्फुटति (न विदीर्यते)। [पक्षान्तरे या अरमिता सा (तादृशी भाग्यहीना नारी) मनसिज-विशिखे न स्फुटति इति न, अपि तु स्फुटत्येव] ॥२॥ अनुवाद—प्रफुल्लित कमलके समान सुललित मुखवाले वनमाली श्रीकृष्णके द्वारा जो सुन्दरी संभुक्ता हुई है, उसे कन्दर्पके विषम बाण कभी भेद नहीं सकते। अथवा विलासकला-पराङ्मुख केवल हास्य-परायण श्रीकृष्णके साथ रमण न कर सकनेवाली वह गोपीका कामके विषमबाणोंसे क्या बिद्ध नहीं होती? अपितु होती ही है।