गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)
Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary
महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२६० श्रीगीतगोविन्दम् पद्यानुवाद— अनिल तरुण मृदु जलज नयनके, विकसित सरसिज ललित वदनके, अमिय मधुर अति मंजु वचनके, थल जलरुहसे रुचिर चरणके। मिले, जिसे हैं सरस भावसे, उसे, कभी वनमाली, पल्लव 'स्मर शर' 'मलय' चन्द—सब जला न पाते आली। बालबोधिनी—श्रीराधा सखीसे कहती है—प्रफुल्लित अरविन्दवत् विलसित मुखकमलवाले वनमाली श्रीकृष्ण जिस रमणीको आनन्द दे रहे हैं, वह क्यों जानेगी कि मदनके बाणोंकी व्यथा कैसी होती है? किस प्रकार मैं विरहसे पीड़ित हो रही हूँ, उस रमिताका कामके बाणोंसे सन्तप्त होनेका प्रश्न ही नहीं उठता। कैसा हृदय विदीर्ण कर दिया है मेरा—यह स्तुतिपरक व्याख्या है। निन्दापरक अर्थमें वे श्रीकृष्ण तो विलासपराङ्मुख हैं, हास्यपरायण हैं, अपने मनोहर मुखसे बस हास-परिहास करते रहते हैं, उनके साथ रमण न कर पानेसे वह गोपिका क्या मदन-शरोंसे सन्तप्त नहीं होती क्या? अवश्य ही होती है। अमृत-मधुर-मृदुतर-वचनेन । ज्वलति न सा मलयज-पवनेन ॥ सखि! या रमिता.... ॥३॥ अन्वय—अमृत-मधुर-मृदुतर-वचनेन (अमृतादपि मधुरं मृदुतरं कोमलतरञ्च वचनं यस्य तेन) वनमालिना या रमिता सा मलयज-पवनेन (मलयानिलेन) न ज्वलति। [अमृतसिक्तया ज्वालातिशयानुपपत्तेः]। [पक्षान्तरे—या अरमिता सा मलयजपवने न ज्वलति इति न, अपि तु ज्वलत्येव] ॥३॥ अनुवाद—अति सुमधुर तथा कोमलतर वचन बोलनेवाले श्रीकृष्णसे जो वनिता रमिता हुई है, उसे मलय-पवनके संपर्कसे कभी ज्वालाका अनुभव नहीं हो सकता है।