गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)
Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary
महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसप्तमः सर्गः—नागर-नारायणः २६१ बालबोधिनी—सखि ! वे अपनी अमृतमयी कोमल और मधुर वाणीसे उस रमणीयाको लुभा रहे हैं। वह कैसे जानेगी कि मलयाचलसे चलनेवाली दक्षिणी बयारसे कैसी ज्वालाएँ उद्भूत होती हैं? कैसी दाहक ज्वलनशील पीड़ा होती है? जो विरहिणियोंको सन्तप्त करती है। अथवा निन्दापरक अर्थमें श्रीकृष्णने जिस गोपिकाके साथ रमण नहीं किया, अपितु अमृतमयी मृदु मधुर वाणीसे लुभाते रहे, वह रमणी क्या मलयानिलसे सन्तप्त नहीं हुई होगी? अवश्य ही हुई होगी। स्थल-जलरुह-रुचि-कर-चरणेन। लुठति न सा हिमकरकिरणेन॥ सखि! या रमिता.... ॥५॥ अन्वय—स्थल-जलरुह-रुचि-कर-चरणेन (स्थल जलरुहस्य स्थलपद्मस्य रुचिरिव रुचिः कान्तिः यस्य तादृशं कर-चरणं पाणिपादं यस्य तादृशेन) वनमालिना या रमिता सा हिमकरकिरणेन (चन्द्रकिरणेन) न लुठति (मूर्च्छिता भूतले न परिवर्त्तते) [इन्दुकिरणानाम् उज्ज्वलतया तापकत्वावगमेऽपि स्थलकमलवत् शीतल-करचरणस्पर्शसुखेनेति भावः]; पक्षान्तरे या अरमिता सा हिमकरकिरणे [किरणं विकिरति सति] न लुठति इति न, अपि तु लुठत्येव] [तादृश-करचरणस्पर्शाभावादिति भावः] ॥४॥ अनुवाद—वनमाली श्रीकृष्णके कर एवं चरण स्थल-कमलके समान कान्तिमय एवं सुशीतल हैं, उनसे जो रमणी संभुक्ता हुई है, उसे चन्द्र-किरणोंसे सन्तापित होकर पृथ्वी पर लुण्ठन नहीं करना पड़ता। बालबोधिनी—श्रीराधा सखिसे कहती है—हे सखि, श्रीकृष्णके कर-तल एवं पद-तल स्थलकमलके समान कान्तिमय एवं सुशीतल हैं। उनके साथ रमण करनेवाली रमणी कैसे जानेगी कि चन्द्रमाकी शीतल किरणें कैसे दहकती हैं, वह उस विधु-कौमुदीसे संतप्त होकर रातभर शय्या पर करवटें