भारतकोश
गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary

महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished448 पृष्ठ

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२६२ श्रीगीतगोविन्दम् क्यों बदलती होगी ? निन्दापरकके अर्थमें, स्थल-कमलके समान अंगोंवाले श्रीकृष्णकी आलिङ्गन प्राप्तिके लिए वह रातभर करवटें बदलती रहती होगी। सजल-जलद-समुदय-रुचिरेण । दहति न सा हृदि विरह-दवेन ॥ सखि ! या रमिता.... ॥५॥ अन्वय—सजल-जलद-समुदय-रुचिरेण (सजल-जलदानां समुदायात् समूहादपि रुचिरेण सुन्दरेण) वनमालिना या रमिता सा विरह-दवेन हृदि न दहति (भस्मीभवति) [जलदवदार्द्रतया दाहासम्भवात्]; पक्षान्तरे—या अरमिता सा विरहदवे (विरहानले) [ज्वलति सति] हृदि न दहति इति न; [अपि तु दहत्येव इत्यर्थः]। नवमेघस्य विरहोद्दीपकत्वात्]॥५॥ अनुवाद—वनमाली श्रीकृष्ण सजल-जलद-मण्डलसे भी मनोहर कान्तिमय एवं सुकुमार हैं। उन श्रीकृष्णके साथ जिस वराङ्गनाने रमण किया, उसे दीर्घकालिक विरहके विषभारसे कभी भी संदलित नहीं होना पड़ता। बालबोधिनी—सखि, जिनका स्वरूप नवीन बादलके समान अतिशय मनोहर है, अति सुकुमार है, उनसे जो रमणी संभुक्ता हुई, उसे विरहरूपी विषसे कदापि भय नहीं रहता। वे तो जलवर्षी मेघके समान उस पर बरस रहे हैं, वह क्या जानेगी कि यह दीर्घकालिक विरह कितना विदलित करता है, कितना विदीर्ण करता है। निन्दापरक अर्थमें—जो गोपी नवजलधर सदृश कान्तिवान श्रीकृष्णके साथ रमण नहीं कर सकी, वह इस दीर्घकालिक विरहके तीव्र-विषसे दुःखी नहीं होगी क्या ? अवश्य ही दुःखी होगी। कनक-निकष-रुचि-शुचि-वसनेन । श्वसिति न सा परिजन-हसनेन ॥ सखि ! या रमिता.... ॥६॥