गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)
Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary
महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसप्तमः सर्गः—नागर-नारायणः २६३ अन्वय—कनक-निकष-रुचि-शुचि-वसनेन (कनकस्य सुवर्णस्य निकषेषु निकष-पाषाणेषु या रुचिः तद्वत् शुचि उज्ज्वलं वसनं यस्य तेन) वनमालिना या रमिता सा परिजन-हसनेन (परिजनानामुपहासेन) न श्वसिति (दीर्घश्वासं न मूर्च्छति) [सौभाग्यगर्वेण काश्चिदपि न गणयतीति भावः]; पक्षान्तरे या अरमिता सा परिजन-हसने [सति] न श्वसिति इति न, [अपि तु श्वसित्येव इत्यर्थः] ॥६॥ अनुवाद—स्वर्ण-निकष (कसौटी) सदृश श्याम वर्णवाले, पवित्र पीतवस्त्र धारण करनेवाले श्रीकृष्णके द्वारा जो सौभाग्यवती रमणी संभुक्ता हुई है, उसे कभी भी परिजनों द्वारा उपहासका कारण बनकर दीर्घनिःश्वास नहीं लेने पड़ते। बालबोधिनी—सखि ! जिन श्रीकृष्णके वसन (वस्त्र) कसौटी पर घिसी हुई स्वर्ण रेखाओंके समान उज्ज्वल, पीत एवं निर्मल हैं (शरीर कसौटी है, वस्त्र सोना है), ऐसे श्रीकृष्ण द्वारा जो कुलबाला रमिता हुई है, वे पीताम्बरी जिस बड़भागिनीको बाहुपाशमें आबद्ध करते हों, तो वह क्या जानेगी कि जब अपने ही परिजन उपहास करते हैं, तब कैसा दुःख होता है? कैसे साँसें घुटती हैं? कैसी म्लानता होती है? निन्दापरक अर्थमें सुवर्णकी कान्तिके समान श्याम कान्तिवाले तथा पीतवस्त्र धारण करनेवाले श्यामसुन्दरके साथ रमण-सुख प्राप्त करनेके लिए जो गोपी कषाय वस्त्र आदिको धारण करती है, उसे अपने परिजनोंके उपहासका पात्र बनकर दुःखी होना ही पड़ता है। सकल-भुवन-जन-वर-तरुणेन। वहति न सा रुजमति-करुणेन ॥ सखि ! या रमिता.... ॥७॥