गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)
Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary
महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२६४ श्रीगीतगोविन्दम् अन्वय—सकल-भुवन-जन-वर-तरुणेन (सकलभुवनेषु ये जनाः युवानस्तेभ्यो वरः श्रेष्ठो यः तरुणः किशोरः तेन) वनमालिना या रमिता सा अतिकरुणेन (अतिशोकेन) रुजं (पीडां) न बहति (प्राप्नोति) [जगद्वल्लभतरुण-प्राप्त्या करुणानुपपत्तेः]; पक्षान्तरे या अरमिता, सा अतिकरुणे रुजं न बहति इति न; [अपितु बहत्येव इत्यर्थः] ॥७॥ अनुवाद—अखिल जगतके तरुण-श्रेष्ठ, सुकुमार मनोहर रूप लावण्य-विशिष्ट श्रीकृष्णके साथ रमण करनेवाली नायिका अपने अन्तःकरणमें दारुण विरह-वेदनाका अनुभव नहीं करती है क्योंकि वे अति करुण हैं। बालबोधिनी—समस्त लोकोंमें जितने भी तरुण युवा पुरुष हैं, उनमें श्रीकृष्ण सर्वातिशय युवतर हैं, सुन्दरतम हैं, वे नवकिशोर नटवर हैं। करुणावरुणालय वे जिस रमणीको भी रमायेंगे, वह अति करुण भावसे मेरी तरह निढाल नहीं पड़ेगी। निन्दापरक अर्थमें जगतमें श्रेष्ठ तरुण पुरुषोंके साथ रमण करनेवाली रमणी, उनमेंसे किसी एकका भी विरह होने पर करुणातिशयताके कारण कष्टका अनुभव करेगी ही। श्रीजयदेव-भणित-वचनेन । प्रविशतु हरिरपि हृदयमनेन ॥ सखि ! या रमिता.... ॥८ ॥ अन्वय—अनेन श्रीजयदेव-भणित-वचनेन (श्रीजयदेवोक्त- श्रीराधायाः माधवमुद्दिश्य वचनेत्यर्थः) हरिरपि [तदेकचित्तानां भक्तानां] हृदयं (चित्तनिकेतनं) प्रविशतु [प्रविष्टः कर्णरन्ध्रेण स्वानां भावसरोरुहमित्युक्तेः] ॥८॥ अनुवाद—श्रीजयदेवकवि विरचित श्रीराधाके विलाप-वचनोंके साथ श्रीहरि भी भक्तोंके हृदयमें प्रवेश करें।