गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)
Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary
महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसप्तमः सर्गः-नागर-नारायणः २६५ पद्यानुवाद- सजल जलद सम फुल्ल वदनके। कनक-निकष सम पीत वसनके ॥ सकल युव जन श्रेष्ठ तरुणके। प्रेरक कवि 'जय' काव्य करुणके ॥ मिले, जिसे हैं सरस भावसे, उसे, कभी वनमाली। विरह, स्वजन-स्वर-व्यङ्ग-दरद-सब जला न पाते आली ॥ बालबोधिनी—जयदेव कविके द्वारा माधवके उद्देश्यसे गाये गये इस प्रबन्धसे प्रसन्न होकर श्रीकृष्ण हृदयमें प्रवेश करें। किसके हृदयमें? श्रीराधाके हृदयमें। साथ ही कर्ण-रन्ध्र द्वारा मेरे-कवि जयदेवके, इस प्रबन्धके पाठकोंके तथा श्रोताओंके भावरूपी हृदय-कमलमें भी प्रवेश करें। नागर नारायण हरि हृदयमें अवस्थित हों। इस प्रकार नारायणमदनायास नामका सोलहवाँ प्रबन्ध समाप्त हुआ। मनोभवानन्दन चन्दनानिल ! प्रसीद रे दक्षिण ! मुञ्च वामताम्। क्षणं जगत्प्राण ! विधाय माधवं। पुरो मम प्राणहरो भविष्यसि ॥१॥ अन्वय—[अत्यावेशेन मनोवाष्पमुद्गिरति दैन्येनाधुना मलयानिलं सविनयं प्रार्थयते]—हे मनोभवानन्दन (आनन्दयतीति आनन्दनः; मनोभवस्य आनन्दनः तत्सम्बुद्धौ हे मदनानन्दकर) हे चन्दनानिल (मलयवायो) प्रसीद (प्रसन्नो भव); [पुनरीर्याद्यादाह]—रे दक्षिण (सरल-स्वभाव, सर्वानुकूल इति यावत्) वामतां (प्रतिकूलतां) मुञ्च (त्यज) [दक्षिणपथप्रवृत्तस्य वाम-पथ प्रवृत्तेरयुक्तत्वात् वामता त्याज्य इति भावः]; [तर्हि किं विधेयं तत्राह]-[जगद्धितोऽपि मनोभवानन्दनाय चन्दनतरु- सम्पर्कात् विषमश्चेत् मां मारयसि तर्हि] हे जगत्प्राण ! क्षणं