गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)
Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary
महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२६६ श्रीगीतगोविन्दम् मम पुरः (अग्रतः) माधवं विधाय (संस्थाप्य) [पश्चात्] मम प्राणहरो भविष्यसि ॥१॥ अनुवाद—हे कन्दर्पको आनन्द देनेवाले मलयाचलके समीर! दक्षिण ही बने रहो! वामताका त्याग कर दो! हे जगतके प्राणस्वरूप! माधवको मेरे सामने कर तुम मेरे प्राण हर लेना। बालबोधिनी—कामदेवके बाणोंके प्रहारको न सह सकनेके कारण श्रीराधा मलयानलको सम्बोधित करती हुई कहती है—कामके बाणोंको उनके लक्ष्य तक पहुँचानेवाली मलयाचलकी वायु मेरे लिए प्रतिकूल बन गयी है, मुझे जलाकर अपने मित्र कामदेवको तो आह्लादित कर दिया और मुझे कामकी पीड़ासे इतना दग्ध कर दिया। दक्षिणानिल कहलाते हो, सम्पूर्ण जगतको आनन्द प्रदान करते हो, फिर मेरे लिए तुम्हारा आचरण प्रतिकूल क्यों है? क्यों वाम भाव धारण किया है? मैं जानती हूँ—तुम मदनके सहचर हो, मलयाचल पर्वत पर सर्पोंसे घिरे हुए चन्दन वृक्षोंके संसर्गसे तुम्हारा स्वभाव अवश्य ही दूषित हो गया है, कितना सन्तप्त कर रहे हो मुझे? हे जगत्प्राण! क्षणभरके लिए प्रसन्न हो जाओ, क्षमा करो मुझे। अपनी प्रतिकूलताका त्याग कर दो, मेरे प्राणोंको हर लेना, पर पहले एक क्षणके लिए प्राणनाथ माधवका दर्शन करा दो, फिर प्राणापहारक बन जाओ। वंशस्थ छन्द है, अतिशयोक्ति अलंकार है। रिपुरिव सखी-संवासोऽयं शिखीव हिमानिलो विषमिव सुधारश्मिर्यस्मिन् दुनोति मनोगते। हृदयमदये तस्मिन्नेवं पुनर्वलते बलात्— कुवलय-दृशां वामः कामो निकामनिरंकुशः ॥२॥ अन्वय—[अथ अनुरागहीने दयिते सानुरागं चित्तं निन्दति]— तस्मिन् (श्रीहरौ) मनोगते (चित्तारूढ़े) [सति] अयं सखीसंवासः