गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)
Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary
महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसप्तमः सर्गः-नागर-नारायणः २६७ (सखीभिः संवासः सहवासः) रिपुरिव (शत्रुरिव) [स्वच्छन्दगमन- प्रतिरोधकत्वात्] दुनोति (क्लिश्नाति); हिमानिलः (शीतलवायुः) [तापकत्वात्] शिखीव (अग्निरिव) [दुनोति]; सुधारश्मिः (चन्द्रः) [दाहकत्वात्] विषमिव [मम मनः] [दुनोति]; [यदि] अदये (दयाहीने) तस्मिन् [कान्ते] एवं पुनः [नानारूपेण कार्यमाणमपि] हृदयं बलात् वलते (संभक्तं स्यात्), [तर्हि] कुवलयदृशां (नीलोत्पलाक्षीणां कामिनीनां) कामः (अभिलाषः) निकाम-निरङ्कुशः (अत्यर्थमयन्त्रितः; हिताहितविचारापगमात् दुर्निवार इत्यर्थः) [अतएव] वामः (प्रतिकूलएव) ॥२॥ अनुवाद—हे सखि! सखियोंका सुखमय साथ, शत्रुके समान मेरे मनको शत्रु की भाँति अनुभूत हो रहा है, सुशीतल सुमन्द समीरण हुताशनके समान प्रतीत हो रहा है और सुधा-रश्मियाँ विषके समान मुझे कष्ट दे रही हैं, फिर भी मेरा हृदय बलात् उसीमें लगा हुआ है, सत्य है, कुवलय सदृश कामिनियोंके प्रति काम सर्वथा ही निरंकुश हुआ करता है। बालबोधिनी—प्रस्तुत श्लोकमें श्रीराधा विरहके उन्मादमें अपने चित्रको ही उपालम्भ देती हुई अपनी सखीसे कहती है—हाय! मैं किसे दोष प्रदान करूँ? उस श्रीकृष्णके स्मरणसे जो मेरी प्रियसखियाँ मुझे श्रीकृष्णके समीप जानेसे मना किया करती थीं, आज उनका सुखमय संग भी मुझे वर्षोंकी शत्रुता जैसा प्रतीत होता है, शीत वायु मुझे ज्वालाके समान दग्ध करती है, चन्द्रमा हलाहल विष जैसा लगता है। फिर भी सखि! मेरा मन उस निर्दय निष्ठुर श्रीकृष्णके प्रति अबाध गतिसे दौड़ता हुआ चला जा रहा है, मेरा अविवेकी मन ही मेरे दुःखका कारण बन गया है। अहो! हिताहित विवेकरहिता कमलनयनाओंके लिए 'काम' ही नितान्त दुर्निवार होकर उनके अशेष दुःखका कारण बन जाता है। यह कामदेव अति निरंकुश है, सुन्दरियोंके प्रति