भारतकोश
गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary

महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished448 पृष्ठ

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२६८ श्रीगीतगोविन्दम्

तो अति ही कठोर है एवं प्रतिकूल है, विरहियोंके प्रति अति निरंकुश आचरण करता है। इस श्लोकमें हरिणी-वृत्त तथा विरोधालङ्कार है। बाधां विधेहि मलयानिल! पञ्चबाण! प्राणान्गृहाण न गृहं पुनराश्रयिष्ये। किं ते कृतान्तभगिनि! क्षमया तरङ्गे- रङ्गानि सिञ्च मम शाम्यतु देहदाहः ॥३॥ अन्वय—[अधुना विरहोत्तप्तया प्राणोत्सर्गः कृत एवाह]—हे मलयानिल, त्वं बाधां (मनःपीडां) विधेहि (जनय) [वामत्वेन बाधाविधान-सामर्थ्यादित्यर्थः]; हे पञ्चबाण, (काम) प्राणान् गृहाण [पञ्चबाण-धारित्वे पञ्चबाणग्रहणयोग्यत्वादित्यर्थः]; हे कृतान्त-भगिनि (यम-सहोदरे यमुने) ते (तव) क्षमया किं? (क्षमां मा कुरु) [यमानुजायाः क्षमा न युक्ता]; [तर्हि किं कर्त्तव्यम्? तरङ्गैः मम अङ्गानि सिञ्च; देहदाहं (शरीरसन्तापः); शाम्यतु (चिरं निवृत्तो भवतु); [एतेन दशमीं दशां विधेहीति ध्वन्यते]; [अहं] पुनः गृहं न आश्रयिष्ये [तेन बिना गृहमपि सन्तापकमेव; ततो मरणमेव युक्तमित्यर्थः] ॥३॥ अनुवाद—हे मलयानिल! तुम बाधाओंका विधान करो! हे पञ्चबाण! तुम मेरे प्राणोंका हरण करो! हे यमुने! तुम यमकी बहन हो, तुम क्यों मुझे क्षमा करोगी? तुम तरङ्गोंके द्वारा मुझे अभिषिक्त कर देना, जिससे मेरे देहका सन्ताप सदाके लिए शान्त हो जाय। बालबोधिनी—संप्रति विरह-ताप-तापिता श्रीराधा अपने प्राणोंको त्यागनेका संकल्प लेकर कहती हैं—हे मलयपवन! हे शीत समीरण! क्यों प्रतीक्षा कर रहे हो? मुझे खूब जमकर पीड़ा देना! हे पञ्चबाण! मेरे प्राणोंका हरण कर लेना, अपने पाँच बाणोंसे तुम मेरे पाँचों प्राणोंका अपहरण